देश की राजधानी दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGI Airport) पर एक बड़ा तकनीकी बदलाव होने जा रहा है। मई 2025 से यहां पर फुल-बॉडी स्कैनर का ट्रायल शुरू किया जाएगा। यह बदलाव नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) के निर्देशों के तहत किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य यात्रियों की सुरक्षा को और भी मजबूत बनाना है।
फिलहाल भारत के ज़्यादातर एयरपोर्ट्स पर पारंपरिक वॉक-थ्रू मेटल डिटेक्टर और हैंड हेल्ड स्कैनर्स का उपयोग होता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फुल-बॉडी स्कैनर को पहले ही अपनाया जा चुका है और भारत अब इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
हालांकि, इस तकनीक के आने से जहां एक ओर सुरक्षा को लेकर उम्मीदें हैं, वहीं दूसरी ओर प्राइवेसी और नैतिकता को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
#WATCH | दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने 5 अप्रैल 2025 को IGI हवाई अड्डे के टर्मिनल 3 पर स्मार्ट पुलिस बूथ का उद्घाटन किया।
दिल्ली पुलिस और GMR के सहयोग से बनी यह आधुनिक सुविधा यात्रियों को रियल-टाइम जानकारी, ई-एफआईआर और 24/7 सहायता प्रदान करेगी।
यह पहल डिजिटल… pic.twitter.com/34eKP4zCm3
— डीडी न्यूज़ (@DDNewsHindi) April 5, 2025
🧠 फुल-बॉडी स्कैनर क्या होते हैं? और कैसे काम करते हैं?
फुल-बॉडी स्कैनर एक ऐसा उन्नत तकनीकी उपकरण है जो किसी व्यक्ति के शरीर के ऊपर या नीचे छिपे किसी भी प्रकार के धातु या गैर-धातु सामग्री की पहचान कर सकता है – चाहे वो प्लास्टिक हो, सिरेमिक हो, जैविक पदार्थ या तरल।
इनमें आम तौर पर दो प्रकार की तकनीकें इस्तेमाल होती हैं:
- मिलिमीटर वेव टेक्नोलॉजी – जो शरीर की सतह के पास मौजूद वस्तुओं की थ्री-डायमेंशनल इमेज बनाती है।
- बैकस्कैटर एक्स-रे – जो शरीर से परावर्तित विकिरण को स्कैन करता है। हालांकि यह तकनीक कई देशों में प्रतिबंधित है क्योंकि इसमें विकिरण होता है।
दिल्ली एयरपोर्ट पर जो स्कैनर्स लगाए जा रहे हैं, वे मिलिमीटर वेव बेस्ड हैं, जिनमें कोई रेडिएशन नहीं होता और ये AI-ऑटोमैटिक थ्रेट डिटेक्शन के साथ आते हैं।
यह तकनीक मेटल डिटेक्टर से कहीं अधिक उन्नत है क्योंकि यह केवल धातु ही नहीं बल्कि अन्य खतरनाक वस्तुओं की भी पहचान कर सकती है।
🛫 दिल्ली एयरपोर्ट पर ट्रायल का पूरा प्लान
दिल्ली एयरपोर्ट पर फुल-बॉडी स्कैनर का ट्रायल सबसे पहले टर्मिनल-2 (T2) पर शुरू किया जाएगा। इसके बाद इसे टर्मिनल-1 और टर्मिनल-3 पर भी लागू करने की योजना है।
DGCA के दिशानिर्देशों के मुताबिक, देश के सभी बड़े एयरपोर्ट्स को फुल-बॉडी स्कैनर लागू करने हैं। लेकिन फिलहाल ट्रायल केवल दिल्ली एयरपोर्ट से शुरू होगा ताकि यात्रियों की प्रतिक्रिया और तकनीकी प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जा सके।
ट्रायल प्लान में शामिल मुख्य बिंदु:
- यात्रियों को अब सिक्योरिटी चेक के दौरान “हाथ उठाकर” एक चैम्बर में खड़ा होना होगा।
- यह स्कैनर 2 से 5 सेकंड में पूरी बॉडी स्कैन कर लेता है।
- स्कैनर से बनी इमेज किसी ऑपरेटर को नहीं दिखाई जाएगी। बल्कि सिस्टम खुद ही थ्रेट डिटेक्शन करेगा और एक जनरलाइज्ड आउटलाइन (stick figure) पर खतरे के पॉइंट दिखाएगा।
- किसी भी प्रकार की इमेज सेव या ट्रांसफर नहीं की जाएगी।
CISF (Central Industrial Security Force) और एयरपोर्ट ऑपरेटर GMR इस पूरे ट्रायल की निगरानी करेंगे।
🗣️यात्रियों की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया बज़
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ यात्रियों ने सुरक्षा में यह तकनीक शामिल होने पर खुशी जताई, जबकि कुछ ने प्राइवेसी को लेकर चिंता व्यक्त की।
रिपोर्ट में शामिल कुछ यात्रियों और विशेषज्ञों ने भी सुझाव दिया कि फुल-बॉडी स्कैनर का उपयोग संवेदनशील दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। खासतौर पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए SOP (Standard Operating Procedures) तैयार की जानी चाहिए।
DGCA ने यह स्पष्ट किया है कि यात्रियों की सहमति और उनकी गरिमा का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
🌍 भारत बनाम अन्य देश – फुल-बॉडी स्कैनर कहाँ-कहाँ?
अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देश अपने प्रमुख एयरपोर्ट्स पर वर्षों से फुल-बॉडी स्कैनर का प्रयोग कर रहे हैं।
TSA (Transportation Security Administration) के अनुसार, अमेरिका में 2010 से यह स्कैनर अनिवार्य हो गए हैं। वहीं यूरोप में इनका प्रयोग काफी पहले से हो रहा है लेकिन वहां यात्रियों को ऑप्ट-आउट का विकल्प दिया जाता है।
भारत में इस तकनीक को लागू करने की प्रक्रिया धीमी रही है क्योंकि:
- इसका बजट काफी बड़ा है
- ट्रेनिंग और SOP की ज़रूरत है
- प्राइवेसी को लेकर कानून स्पष्ट नहीं हैं
अब जबकि DGCA ने इसे अनिवार्य किया है, भारत भी इस दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है।
🛡️क्या यात्रियों की सुरक्षा को मिलेगा नया आयाम?
फुल-बॉडी स्कैनर न केवल मेटल बल्कि गैर-धातु खतरों को भी पहचान सकता है जैसे कि प्लास्टिक में छिपे हथियार, तरल विस्फोटक आदि।
2009 में अमेरिका में हुए एक अंडरवियर बम हमले के बाद से फुल-बॉडी स्कैनर को अनिवार्य किया गया। तब से यह तकनीक कई बार संभावित आतंकी हमलों को रोकने में मददगार साबित हुई है।
भारत जैसे देश में जहां हर साल करोड़ों यात्री एयर ट्रैवल करते हैं, वहां सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्कैनर की मदद से:
- यात्री जांच प्रक्रिया तेज होगी
- CISF की मैनुअल चेकिंग पर निर्भरता घटेगी
- कई बार होने वाली इंसानी भूलें कम होंगी
हालांकि तकनीक सब कुछ नहीं होती, इसका इस्तेमाल सही नीतियों और मानवतावादी दृष्टिकोण के साथ होना जरूरी है।
🔐प्राइवेसी और नैतिकता के मुद्दे
फुल-बॉडी स्कैनर को लेकर सबसे बड़ा सवाल है – क्या यह आपकी निजता का उल्लंघन है?
इसका जवाब तकनीक की डिटेल में छुपा है। नई मिलिमीटर वेव तकनीक केवल एक जनरलाइज्ड आउटलाइन बनाती है और कोई वास्तविक इमेज सेव या ट्रांसफर नहीं होती।
DGCA ने ये नियम तय किए हैं:
- कोई भी इमेज सेव नहीं होगी
- स्कैनर जेंडर बेस्ड नहीं होंगे
- किसी यात्री को बिना सहमति स्कैन नहीं किया जाएगा
- जरूरत पड़ने पर महिला यात्री को महिला स्टाफ ही स्कैन करेगा
इसके बावजूद, यात्रियों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि स्कैन कैसे होगा, कितनी देर लगेगी और उनका डेटा सुरक्षित कैसे रहेगा।
निष्कर्ष
फुल-बॉडी स्कैनर का आना भारत के एविएशन सेक्टर में एक सुरक्षा-संबंधी बड़ा कदम है। यह न सिर्फ सुरक्षा के नए मानदंड तय करेगा, बल्कि यात्रियों के लिए एक नया अनुभव भी लेकर आएगा।
हालांकि इसके सफल क्रियान्वयन के लिए जरूरी है कि यात्रियों को पहले से जागरूक किया जाए, स्टाफ को प्रशिक्षित किया जाए और प्राइवेसी को सर्वोपरि रखा जाए।
सुरक्षा और गरिमा, दोनों का संतुलन बनाए रखना ही इस तकनीक की सफलता की कुंजी होगी।