गिग इकोनॉमी का विकास: Ola Uber Strike की पृष्ठभूमि
भारत में गिग इकोनॉमी का उदय 2010 के दशक में हुआ, जब उबर ने 2013 में और ओला ने 2011 में अपनी सेवाएं शुरू कीं। रैपिडो जैसी कंपनियां बाद में आईं, लेकिन सभी ने एक ही मॉडल अपनाया – ऐप-बेस्ड राइड-हेलिंग, जहां ड्राइवर स्वतंत्र कॉन्ट्रैक्टर होते हैं। शुरू में यह क्रांति जैसा लगा: लाखों लोगों को रोजगार मिला, यात्रियों को सस्ती सवारी। लेकिन समय के साथ दरारें दिखने लगीं।
‘Ola Uber Strike’ जैसी घटनाएं पहले भी हुई हैं। 2018 में मुंबई में ड्राइवरों ने हड़ताल की थी, 2020 में कोविड के दौरान मांगें उठीं, और अब 2026 में यह राष्ट्रव्यापी स्तर पर पहुंच गई है। तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) जैसी यूनियनों ने नेतृत्व किया है। वे कहते हैं कि कंपनियां ड्राइवरों का शोषण कर रही हैं – कमीशन 30-40% तक लेती हैं, जबकि किराया घटता जा रहा है।
इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) के अनुसार, 40% ड्राइवर महीने में 15,000 रुपये से कम कमाते हैं। ईंधन की कीमतें बढ़ीं, मेंटेनेंस कॉस्ट ऊपर, लेकिन किराया वही। यह ‘Ola Uber Strike’ इसी असंतोष का नतीजा है।
हड़ताल के कारण: क्यों हो रही है Ola Uber Strike?
‘Ola Uber Strike’ के पीछे कई कारण हैं, जो ड्राइवरों की दैनिक जिंदगी से जुड़े हैं। सबसे बड़ा मुद्दा है न्यूनतम बेस फेयर की कमी। ड्राइवर कहते हैं कि 10 किमी की राइड पर कभी 100 रुपये मिलते हैं, कभी 150 – कोई गारंटी नहीं। कमीशन कटने के बाद हाथ में कुछ नहीं बचता।
दूसरा, सुरक्षा। महिलाओं के लिए पैनिक बटन की मांग है, लेकिन लागू नहीं हो रहा। बाइक टैक्सी पर प्रतिबंध कुछ राज्यों में लगा, जो रोजगार छीन रहा है। तीसरा, अनियमित कमीशन। कंपनियां 20% कहती हैं, लेकिन एक्स्ट्रा चार्जेस से 40% तक पहुंच जाता है।
चौथा, कोई सोशल सिक्योरिटी नहीं। कोई पेंशन, कोई हेल्थ इंश्योरेंस। कोविड में ड्राइवरों ने देखा कि कंपनियां पीठ दिखा गईं। TGPWU के एक नेता ने कहा, “हम रोबोट नहीं, इंसान हैं।” यह ‘Ola Uber Strike’ इन सबकी चरम सीमा है।
ड्राइवरों की मांगें: Ola Uber Strike में क्या चाहते हैं वे?
‘Ola Uber Strike’ की मुख्य मांगें स्पष्ट हैं:
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न्यूनतम बेस फेयर: हर राइड पर कम से कम 200-300 रुपये की गारंटी।
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कमीशन कैप: 20% से ज्यादा न काटा जाए।
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सुरक्षा उपाय: पैनिक बटन, बैकग्राउंड चेक, और महिलाओं के लिए स्पेशल प्रोटोकॉल।
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बाइक टैक्सी रेगुलेशन: प्रतिबंध हटाएं, लाइसेंस आसान बनाएं।
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सोशल सिक्योरिटी: हेल्थ इंश्योरेंस, PF जैसी सुविधाएं।
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यूनियन मान्यता: ड्राइवर यूनियनों को बातचीत में शामिल करें।
ये मांगें IFAT और TGPWU जैसी यूनियनों से आई हैं। वे कहते हैं कि अगर नहीं मानी गईं, तो हड़ताल लंबी चलेगी।
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