थाईलैंड और कंबोडिया के बीच दशकों से चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर भड़क उठा है। बीते सप्ताह दोनों देशों की सीमा पर हुई हिंसा में अब तक 32 लोगों की मौत हो चुकी है और दर्जनों घायल हुए हैं। आम नागरिकों की मौत ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश और चिंता का माहौल बना दिया है।
गौरतलब है कि हाल ही में थाईलैंड-कंबोडिया संघर्ष में 32 लोगों की मौत हुई थी और संयुक्त राष्ट्र को आपात बैठक बुलानी पड़ी थी। इसके बाद ही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट को सुलझाने की कोशिशों की पहल की।
📌 ट्रंप की एंट्री: डिप्लोमेसी या व्यक्तिगत एजेंडा?
डोनाल्ड ट्रंप, जो आने वाले अमेरिकी चुनावों में फिर से मैदान में हैं, ने इस मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक सार्वजनिक बयान में कहा, “शांति की कोई कीमत नहीं होती, लेकिन युद्ध की कीमत सब चुकाते हैं।”
ट्रंप की इस पहल को ASEAN देशों ने काफी सकारात्मक रूप में देखा है। उनके प्रयासों से ही आज मलेशिया में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच सीमा संघर्ष पर सीधी बातचीत होने जा रही है।
ट्रंप के इस डिप्लोमैटिक हस्तक्षेप ने जहां एक ओर विश्व समुदाय को चौंकाया, वहीं दूसरी ओर कई विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि को सुधारने का प्रयास भी हो सकता है।
— MAGA Resource (@MAGAResource) July 27, 2025
🗓️ मलेशिया में शांति वार्ता: एजेंडा क्या है?
आज यानी सोमवार को मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में थाईलैंड के प्रधानमंत्री प्रयुत चान-ओ-चा और कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेत के बीच सीधी वार्ता होगी। इस वार्ता में निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा होगी:
- सीमा पर गोलीबारी को रोकने के लिए सीज़फायर समझौता
- नागरिक हताहतों के मुआवज़े
- सीमा निर्धारण पर संयुक्त समिति का गठन
- विवादास्पद क्षेत्रों से सेना हटाने का प्रस्ताव
मलेशिया इस बातचीत की मेजबानी कर रहा है और वियतनाम जैसे देशों की मौजूदगी से बातचीत को बढ़ा हुआ अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला है।
🌍 भारत और एशिया पर असर
इस तनावपूर्ण स्थिति पर भारत की ओर से संतुलित प्रतिक्रिया आई है। भारत ने कहा कि वह “सीमा विवाद को शांतिपूर्ण बातचीत से सुलझाने के पक्ष में है और ASEAN की एकता का समर्थन करता है।”
भारत के लिए इस मुद्दे का महत्व इसलिए भी है क्योंकि:
- ASEAN के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते गहरे हैं
- क्षेत्रीय अशांति का असर पूरे इंडो-पैसिफिक में दिख सकता है
- डिफेंस और इकोनॉमिक पॉलिसीज पर भी इसका प्रभाव संभव है
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस समय साफ और तटस्थ भूमिका निभानी चाहिए, ताकि वह भविष्य में भी ASEAN की राजनीति में विश्वसनीय साझेदार बना रहे।
👥 स्थानीय जनता की राय और जमीनी हालात
सीमा पर बसे थाईलैंड और कंबोडिया के नागरिकों में भय और असुरक्षा का माहौल है। कई गांव खाली कराए गए हैं, स्कूल और बाजार बंद हो चुके हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है:
“हमें नेताओं से सिर्फ एक चीज चाहिए—शांति। हम युद्ध नहीं चाहते।”
पिछले सप्ताह की हिंसा में कई मासूमों की जान गई थी, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं। आम जनता को उम्मीद है कि आज की बैठक कोई ठोस नतीजा लेकर आएगी।
📈 क्षेत्रीय राजनीति में हलचल
थाईलैंड और कंबोडिया के इस तनाव ने पूरी ASEAN राजनीति को सक्रिय मोड में ला दिया है। मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों ने खुलकर शांति की अपील की है।
इस विवाद ने चीन और अमेरिका के बीच क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक टकराव की स्थिति भी बना दी है। जहां अमेरिका खुलकर मध्यस्थता में लगा है, वहीं चीन ने “भीतरू कूटनीति” अपनाई है।
🧠 क्या यह बैठक स्थायी शांति ला पाएगी?
विशेषज्ञों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। कुछ मानते हैं कि ट्रंप की मध्यस्थता से बात आगे बढ़ेगी, जबकि कुछ को डर है कि यह सिर्फ राजनीतिक स्टंट बनकर न रह जाए।
हालांकि, आज की बैठक से अगर सीज़फायर की घोषणा हो जाती है, तो यह पहला मजबूत कदम माना जाएगा। दोनों देशों को साथ मिलकर दीर्घकालिक सीमा समाधान खोजना होगा।
🔚 उम्मीद की किरण
आज की मलेशिया वार्ता सिर्फ थाईलैंड और कंबोडिया के लिए नहीं, बल्कि पूरे एशिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रंप की पहल से शांति की उम्मीद तो बनी है, लेकिन भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि ये देश अपने राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर आम जनता के भले के लिए क्या निर्णय लेते हैं।
अगर यह बैठक सफल होती है, तो यह दुनिया को दिखाएगा कि संघर्ष नहीं, संवाद ही समाधान है।




















