तेल और बढ़ते टैरिफ
रूस लंबे समय से वैश्विक तेल और गैस बाजार में एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता माना जाता है। इसकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा ऊर्जा निर्यात पर निर्भर करता है। यूक्रेन संघर्ष के बाद से पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन अब अमेरिकी ट्रेज़री प्रमुख ने एक बड़ा बयान देकर वैश्विक हलकों में चिंता बढ़ा दी है। उनका कहना है कि तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाना रूस की आर्थिक व्यवस्था को गहरे संकट में डाल सकता है।
यह बयान उस समय आया है जब रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिकी नेतृत्व यह मानता है कि रूस को रोकने के लिए आर्थिक दबाव सबसे कारगर तरीका है। दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में अमेरिका ने अपने रक्षा ढांचे को लेकर भी कड़ा संदेश दिया था। इसी कड़ी में यह खबर भी सुर्खियों में रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस का नाम बदलकर डिपार्टमेंट ऑफ वॉर कर दिया, जो दर्शाता है कि अमेरिका वैश्विक रणनीति में और आक्रामक रुख अपना रहा है।
अमेरिकी ट्रेज़री प्रमुख का बयान
अमेरिकी ट्रेज़री प्रमुख स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर तेल खरीददार देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लागू किए गए, तो रूस के पास अपने राजस्व स्रोतों को बनाए रखने का कोई रास्ता नहीं बचेगा। उनके अनुसार, रूस की अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है और ऐसे कदम से यह पूरी तरह चरमरा सकती है।
इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल मचा दी। यूरोपीय संघ और अमेरिकी सहयोगी देशों ने भी इस दिशा में समर्थन जताने के संकेत दिए हैं। यह कदम केवल रूस को कमजोर करने के लिए नहीं बल्कि उसे यूक्रेन वार्ता की मेज पर लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
तेल-आधारित आय और रूस की निर्भरता
रूस की आर्थिक संरचना को देखें तो तेल और गैस निर्यात उसकी आय का बड़ा हिस्सा है। सरकार के बजट का एक बड़ा अंश इसी सेक्टर से आता है। अगर इन पर टैरिफ लग जाते हैं, तो रूस के लिए न केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच मुश्किल होगी बल्कि घरेलू स्तर पर भी वित्तीय संकट गहरा जाएगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस की अर्थव्यवस्था अन्य क्षेत्रों में उतनी मजबूत नहीं है कि वह ऊर्जा निर्यात की कमी को पूरा कर सके। ऐसे में टैरिफ लागू होना सीधा आर्थिक झटका होगा।
.@SecScottBessent: “We are prepared to increase pressure on Russia, but we need our European partners to follow us… If the U.S. and the EU can come in, do more sanctions, secondary tariffs on the countries that buy Russian oil, the Russian economy will be in full collapse.” pic.twitter.com/fNfGiofCsr
— Rapid Response 47 (@RapidResponse47) September 7, 2025
वैश्विक प्रतिक्रिया – यूरोप और एशिया
यूरोपीय संघ ने पहले ही रूसी तेल पर कई तरह की पाबंदियां लगाई हैं। अब अगर अमेरिकी रणनीति के तहत और सख्ती आती है, तो यूरोप इसके साथ खड़ा हो सकता है। वहीं, एशियाई देशों की स्थिति थोड़ी अलग है।
भारत और चीन जैसे बड़े उपभोक्ता देशों ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपने आयात बिल को नियंत्रित किया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। लेकिन अगर टैरिफ बढ़ते हैं, तो इन देशों को भी रणनीति बदलनी पड़ेगी।
अमेरिकी रणनीति – टैरिफ क्यों और कैसे?
अमेरिका का कहना है कि रूस को यूक्रेन संघर्ष से पीछे हटाने के लिए केवल सैन्य दबाव काफी नहीं है। आर्थिक दबाव डालना जरूरी है। यही कारण है कि अब तेल खरीददार देशों पर टैरिफ का विकल्प सामने आया है।
यह रणनीति रूस के लिए दोहरा झटका होगी – एक ओर उसे अपने उत्पाद बेचने में दिक्कत होगी और दूसरी ओर उसकी आय में भारी कमी आएगी। अमेरिका का मानना है कि अगर रूस की आर्थिक रीढ़ टूटती है, तो उसे वार्ता की मेज पर आने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
रूस क्या कर सकता है?
रूस ने पहले भी पश्चिमी प्रतिबंधों का मुकाबला करने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशे हैं। उसने एशियाई बाजारों की ओर रुख किया, नई व्यापारिक साझेदारियां बनाईं और अपनी आंतरिक अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिश की।
हालांकि, टैरिफ का असर अलग होगा। इससे रूस को न केवल बाजार में दिक्कत होगी बल्कि खरीदार देशों को भी अतिरिक्त लागत झेलनी पड़ेगी। ऐसे में रूस के पास विकल्प सीमित रह जाएंगे।
वैश्विक तेल बाजार पर असर
टैरिफ लागू होते ही तेल की कीमतों में उछाल आना तय है। वैश्विक स्तर पर मांग और आपूर्ति में असंतुलन पैदा होगा। OPEC देशों को भी रणनीति बनानी होगी कि वे किस तरह उत्पादन को समायोजित करें।
आम उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा। ऊर्जा की लागत बढ़ेगी, महंगाई का दबाव बढ़ेगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। यह स्थिति विश्वव्यापी ऊर्जा संकट को और गहरा सकती है।
भारत पर असर
भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। एक ओर उसे सस्ते तेल की जरूरत है ताकि घरेलू महंगाई पर नियंत्रण रखा जा सके, वहीं दूसरी ओर उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव का भी सामना करना पड़ सकता है।
भारत ने अब तक संतुलन बनाए रखा है, लेकिन आगे चलकर अगर टैरिफ बहुत भारी साबित होते हैं, तो उसे अपनी रणनीति बदलनी होगी। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं पर असर पड़ना तय है।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की अर्थव्यवस्था पर पहले ही गहरा दबाव है। यदि अमेरिका और उसके सहयोगी टैरिफ लागू करते हैं, तो रूस की स्थिति और खराब हो सकती है। हालांकि, कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि रूस लंबे समय तक इस दबाव को सह सकता है और एशियाई देशों के सहारे अपनी स्थिति बनाए रख सकता है।
पाठक से सवाल
स्पष्ट है कि अमेरिकी ट्रेज़री प्रमुख का यह बयान वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा संकेत है। रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की यह रणनीति आने वाले समय में तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को गहराई से प्रभावित करेगी।
आपके अनुसार क्या रूस इन टैरिफ़ से उबर पाएगा या वाकई उसकी अर्थव्यवस्था ढह जाएगी? अपनी राय हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।




















