ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है – क्षेत्रफल लगभग 21 लाख वर्ग किलोमीटर, लेकिन आबादी सिर्फ 56,000 के आसपास। 80% से ज्यादा हिस्सा बर्फ की चादर से ढका है, जो दुनिया की सबसे बड़ी आइस शीट्स में से एक है। नाम “ग्रीनलैंड” विडंबनापूर्ण है – यहां ज्यादातर बर्फ और ठंड है, हरा-भरा बहुत कम। यह डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, 1953 से डेनिश संविधान का हिस्सा, लेकिन 2009 से ज्यादा स्वशासन मिला है – अपनी सरकार, संसद, लेकिन विदेश नीति और रक्षा डेनमार्क के पास।
इतिहास में ग्रीनलैंड हमेशा रणनीतिक रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने यहां बेस बनाए थे। 1951 में थुले एयर बेस (अब पिटुफिक स्पेस बेस) स्थापित हुआ, जो आज भी US स्पेस फोर्स का हिस्सा है – मिसाइल वार्निंग, स्पेस सर्विलांस और आर्कटिक मॉनिटरिंग के लिए महत्वपूर्ण। ट्रंप इसे “आर्कटिक सिक्योरिटी गार्डपोस्ट” कहते हैं, क्योंकि क्लाइमेट चेंज से आर्कटिक में नए शिपिंग रूट खुल रहे हैं – नॉर्दर्न सी रूट, जो यूरोप-एशिया के बीच छोटा रास्ता देता है। साथ ही, ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ एलिमेंट्स, यूरेनियम, जिंक, लिथियम जैसे मिनरल्स हैं – इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, टेक और डिफेंस के लिए जरूरी। चीन और रूस भी यहां रुचि रखते हैं।
ट्रंप ने 2019 में पहली बार ग्रीनलैंड “खरीदने” की बात की थी – डेनिश पीएम मेट्टे फ्रेडरिकसेन ने “absurd” कहकर ठुकरा दिया। लेकिन 2024 चुनाव जीतने के बाद, 2026 में ट्रंप ने इसे फिर से उठाया। उनका तर्क: रूस और चीन आर्कटिक में बढ़ रहे हैं, NATO को मजबूत करने के लिए ग्रीनलैंड जरूरी। लेकिन विरोधी कहते हैं कि यह संसाधनों और ईगो की लड़ाई है। ग्रीनलैंड के लोग इंडिपेंडेंस चाहते हैं – न डेनमार्क से, न अमेरिका से। वे कहते हैं, “Greenland for Greenlanders”।
ट्रंप की 2026 स्ट्रैटेजी: टैरिफ धमकी से मिलिट्री तक
जनवरी 2026 में ट्रंप ने Truth Social पर पोस्ट किया – आठ यूरोपीय देशों पर टैरिफ: 1 फरवरी से 10%, जून 1 से 25% – जब तक ग्रीनलैंड का डील नहीं होता। उन्होंने कहा, “No going back.” व्हाइट हाउस ब्रीफिंग में “You’ll find out” कहा। ट्रंप ने NATO पर भी सवाल उठाए – “NATO जितना मजबूत है, उतना ही जितना अमेरिका चाहे।” क्या वे NATO छोड़ देंगे? यह बड़ा रिस्क है।
ग्रीनलैंड पीएम नीलेसन ने कहा, “हम सब कुछ के लिए तैयार हैं। मिलिट्री कॉन्फ्लिक्ट को रूल आउट नहीं किया जा सकता।” अमेरिका ने NORAD एयरक्राफ्ट पिटुफिक बेस पर भेजे हैं। ट्रंप का “गोल्डन डोम शील्ड” शायद एक नया डिफेंस सिस्टम है, जिसमें ग्रीनलैंड की लोकेशन महत्वपूर्ण है। लेकिन यूरोप इसे ब्लैकमेल मान रहा है। ट्रंप डावोस जा रहे हैं, जहां कई मीटिंग्स ग्रीनलैंड पर हैं। वे कहते हैं, “डील बहुत अच्छी होगी सबके लिए।” लेकिन यूरोपीय लीडर्स गुस्से में हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं: यूरोप, NATO और रूस-चीन की चुप्पी
डेनमार्क की पीएम फ्रेडरिकसेन ने कहा, “संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं।” EU की फॉरेन पॉलिसी चीफ काजा कल्लास बोलीं, “टैरिफ दोनों तरफ नुकसान पहुंचाएंगे।” फ्रांस के मैक्रों ने “अनएक्सेप्टेबल” कहा। NATO लीडर्स चेतावनी दे रहे हैं कि यह अलायंस को तोड़ सकता है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने मिलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की – ग्रीनलैंड ने कहा, “हम डेनमार्क चुनेंगे अमेरिका के बजाय।”
प्रोटेस्ट हुए – कोपेनहेगन और ग्रीनलैंड में “Hands Off Greenland” डेमो। लोग ग्रीनलैंड फ्लैग लहरा रहे थे। रूस और चीन चुप हैं, लेकिन आर्कटिक में उनकी एक्टिविटी बढ़ रही है। ट्रंप का दावा है कि चीन और रूस से बचाव के लिए ग्रीनलैंड जरूरी। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि यह ट्रंप की नेगोशिएशन टैक्टिक है – पहले धमकी, फिर डील।
वैश्विक राजनीतिक अपडेट
भारत पर Greenland News का असर: आर्थिक, जलवायु और जियोपॉलिटिकल
भारत में Greenland News ट्रेंडिंग है क्योंकि ट्रंप के टैरिफ से ग्लोबल ट्रेड प्रभावित हो सकता है। अगर यूएस-ईयू ट्रेड वॉर हुआ, तो भारतीय एक्सपोर्ट्स – स्टील, टेक्सटाइल, फार्मा – पर असर। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज गिरा, क्योंकि अनिश्चितता बढ़ी। गोल्ड $4800/oz के पार, सिल्वर $96 पर – निवेशक सेफ हैवन में भाग रहे हैं।
आर्कटिक में भारत ऑब्जर्वर है – हमारी रिसर्च स्टेशन वहां हैं। ग्रीनलैंड की आइस शीट पिघल रही है – अगर और तेज हुई, तो समुद्र स्तर 7 मीटर तक बढ़ सकता है। कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे शहर डूबने के खतरे में। जलवायु सम्मेलनों में भारत सक्रिय है, लेकिन ट्रंप का कदम पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है अगर मिनिंग बढ़ी।
जियोपॉलिटिकल रूप से, अगर NATO कमजोर हुआ, तो इंडो-पैसिफिक में चीन की ताकत बढ़ेगी। भारत को सतर्क रहना होगा – अमेरिका के साथ क्वाड, लेकिन यूरोप के साथ भी संबंध।
जलवायु परिवर्तन और आर्थिक प्रभाव का विस्तार
ग्रीनलैंड की आइस शीट अगर पूरी पिघली, तो ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा संकेत। ट्रंप का अधिग्रहण मिनिंग बढ़ा सकता है, जो पर्यावरण को और बिगाड़ेगा। भारत में मानसून पैटर्न बदल सकता है। आर्थिक रूप से, टैरिफ से वॉल स्ट्रीट का सबसे बुरा दिन – डाउ 900 पॉइंट गिरा। यूरोपीय मार्केट भी प्रभावित। भारत के लिए, अगर ट्रेड वॉर लंबा चला, तो GDP ग्रोथ प्रभावित हो सकती है।
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