National Girl Child Day की शुरुआत 2008 में हुई थी। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने इस दिन को राष्ट्रीय स्तर पर मनाने का फैसला किया। इसका मुख्य उद्देश्य था बालिकाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को उजागर करना और उनके अधिकारों पर देशव्यापी चर्चा शुरू करना।
2008 से पहले भी कई प्रयास हो चुके थे। 1990 के दशक में महिला भ्रूण हत्या (female foeticide) की समस्या चरम पर थी। 2001 की जनगणना में 0-6 वर्ष के बच्चों का लिंग अनुपात सिर्फ 927 लड़कियां प्रति 1000 लड़कों पर था – यानी हर 1000 लड़कों के पीछे 73 लड़कियां कम थीं। यह आंकड़ा समाज के लिए शर्म का विषय था।
कई राज्य सरकारें पहले से ही काम कर रही थीं – जैसे हरियाणा में लाड़ली योजना, राजस्थान में बालिका शिक्षा प्रोत्साहन योजना आदि। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एक एकीकृत अभियान की जरूरत महसूस हुई। इसी कमी को पूरा करने के लिए 24 जनवरी 2008 को पहला National Girl Child Day मनाया गया।
यह तारीख इसलिए चुनी गई क्योंकि 24 जनवरी को भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्मदिन भी है। हालांकि आधिकारिक तौर पर यह दिन इंदिरा गांधी से सीधे जुड़ा नहीं है, लेकिन उनकी महिला सशक्तिकरण वाली विरासत को ध्यान में रखकर यह तारीख चुनी गई।
2015 में इसी दिन के आसपास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत हरियाणा के पानीपत से की, जो आज देश की सबसे बड़ी बालिका सशक्तिकरण योजना बन चुकी है। 2026 तक इस अभियान को 18 साल हो चुके हैं और इस दौरान लिंग अनुपात में सुधार हुआ है। NFHS-5 (2019-21) के अनुसार, 0-6 वर्ष का लिंग अनुपात अब 929 तक पहुंच गया है और कुल लिंग अनुपात (सभी आयु वर्ग) 1020 महिलाएं प्रति 1000 पुरुषों तक पहुंच चुका है।
यह बदलाव छोटा-छोटा लग सकता है, लेकिन लाखों बेटियों की जिंदगी बचाने और उन्हें स्कूल भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस का महत्व: क्यों मनाते हैं हम यह दिन?
National Girl Child Day का महत्व सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है।
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शिक्षा का अधिकार – आज भी ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में लड़कियां 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। UDISE+ 2024-25 के अनुसार माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का GER (Gross Enrolment Ratio) 80.2% है, जो अच्छा है लेकिन अभी भी सुधार की गुंजाइश है।
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स्वास्थ्य और पोषण – NFHS-5 बताता है कि 35% किशोरियां एनीमिक हैं। कुपोषण और मासिक धर्म स्वास्थ्य जैसी बातें अभी भी टैबू हैं।
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सुरक्षा – बाल विवाह, घरेलू हिंसा, यौन शोषण – ये समस्याएं आज भी मौजूद हैं। UNICEF के अनुसार भारत में 23% लड़कियां 18 साल से पहले शादी कर लेती हैं।
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आर्थिक सशक्तिकरण – विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर लड़कियां और लड़के बराबर शिक्षा और रोजगार पाएं तो भारत की GDP में 1.5-2% का अतिरिक्त योगदान हो सकता है।
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सामाजिक बदलाव – जब बेटियां शिक्षित और सशक्त होती हैं तो पूरा परिवार, गांव और समाज आगे बढ़ता है।
इसलिए National Girl Child Day सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि 365 दिनों का संकल्प है – कि हम बेटियों को बराबरी का हक दें, उन्हें डर के बजाय सपने देखने की आजादी दें।
2026 में राष्ट्रीय बालिका दिवस: ताजा खबरें और उत्सव
आज सुबह 11:16 बजे IST (कोलकाता समय) तक देशभर में कई कार्यक्रम चल रहे हैं।
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केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने नई दिल्ली से वर्चुअल संदेश दिया कि इस साल थीम है “सशक्त बालिका, समृद्ध भारत”।
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पश्चिम बंगाल सरकार ने कन्याश्री योजना के तहत आज 50,000 नई छात्रवृत्तियां घोषित कीं।
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आंध्र प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री ने विजयवाड़ा में एक बड़े समारोह में कहा – “बेटियां सिर्फ घर की नहीं, राष्ट्र की शान हैं।”
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सोशल मीडिया पर #NationalGirlChildDay और #BetiBachaoBetiPadhao ट्रेंड कर रहे हैं।
स्कूलों में निबंध, चित्रकला, भाषण प्रतियोगिताएं हो रही हैं। कई NGOs ने ऑनलाइन वेबिनार आयोजित किए जहां विशेषज्ञ बालिकाओं के मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल सुरक्षा और करियर गाइडेंस पर बात कर रहे हैं।
कोलकाता में भी आज कई जगह कार्यक्रम हैं – रवीन्द्र सरोवर के पास जागरूकता रैली, सॉल्ट लेक में बालिका शिक्षा मेला और कई स्कूलों में “बेटी के नाम” पर पौधारोपण।
यह दिन अब सिर्फ सरकारी आयोजन नहीं रहा, बल्कि लोगों का अपना उत्सव बन चुका है।
भारत सरकार की प्रमुख योजनाएं बालिकाओं के लिए
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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP) – 2015 से शुरू, लिंग अनुपात सुधार, शिक्षा और सुरक्षा पर फोकस।
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सुकन्या समृद्धि योजना – बालिका के नाम पर बचत खाता, 7.6% ब्याज दर (2026 में)।
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कन्याश्री योजना (पश्चिम बंगाल) – 13-18 साल की लड़कियों को सालाना 750-25,000 रुपये की छात्रवृत्ति।
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लाड़ली लक्ष्मी योजना – कई राज्यों में अलग-अलग नाम से।
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प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना – गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को 5000 रुपये।
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पोषण अभियान – कुपोषण मुक्त भारत के लिए।
इन योजनाओं ने लाखों परिवारों को प्रेरित किया है कि बेटी पैदा होना उत्सव का मौका है, बोझ नहीं।
आज भी बाकी चुनौतियां
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ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल डिवाइड – लड़कियों के पास स्मार्टफोन और इंटरनेट कम।
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मासिक धर्म की वजह से स्कूल छूटना।
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कार्यस्थल पर लिंग भेदभाव।
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साइबर क्राइम में वृद्धि – खासकर किशोरियों के खिलाफ।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा, कानून और सामाजिक जागरूकता तीनों का संतुलन जरूरी है।
प्रेरणादायक सफलता की कहानियां
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हरियाणा के एक गांव की रिया ने IAS बनकर पूरे ब्लॉक को प्रेरित किया।
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बिहार की नेहा कुमारी ने UPSC क्रैक कर दिखाया कि गरीबी बाधा नहीं बनती।
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पश्चिम बंगाल की कन्याश्री लड़कियां आज डॉक्टर, इंजीनियर, पुलिस अधिकारी बन रही हैं।
ये कहानियां बताती हैं कि अगर अवसर मिले तो बेटियां आसमान छू सकती हैं।
अंत में: हमारा संकल्प
National Girl Child Day हमें याद दिलाता है कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि देश का सबसे बड़ा संसाधन हैं।
आइए आज संकल्प लें –
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अपने घर में बेटी को बराबरी दें।
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पड़ोस की लड़की की पढ़ाई में मदद करें।
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किसी भी लिंग भेदभाव पर आवाज उठाएं।



















