पंजाब के सार्वजनिक अस्पतालों में हाल के दिनों में डॉक्टरों पर बढ़ते हमलों ने चिकित्सा समुदाय को गंभीर चिंता में डाल दिया है। इलाज के दौरान मरीजों के परिजनों द्वारा की गई हिंसा की घटनाएं अब आम हो गई हैं, जिससे डॉक्टरों का मनोबल टूट रहा है।
इस बिगड़ती स्थिति के खिलाफ आवाज उठाते हुए डॉक्टरों ने सरकार को 7 दिनों की डेडलाइन दी है, और मांग की है कि सभी अस्पतालों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं। यदि मांगें पूरी नहीं हुईं, तो राज्यव्यापी हड़ताल की चेतावनी दी गई है।
ताजा घटनाएं: कहां-कहां हुआ हमला और क्यों?
हाल के महीनों में पंजाब के विभिन्न जिलों से डॉक्टरों पर हमले की खबरें सामने आई हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
पटियाला मेडिकल कॉलेज अस्पताल:
यहां मरीज की मौत के बाद गुस्साए परिजनों ने इमरजेंसी वार्ड में घुसकर डॉक्टरों को धमकाया।
तंदा अस्पताल (होशियारपुर):
यहां एक गर्भवती महिला की हालत बिगड़ने पर परिजनों ने महिला डॉक्टर पर आरोप लगाते हुए हमला किया।
फरीदकोट मेडिकल कॉलेज:
ICU में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर के साथ तीमारदारों ने मारपीट की।
बठिंडा एम्स:
एम्स जैसे अत्याधुनिक संस्थान में भी डॉक्टरों को हिंसा का सामना करना पड़ा, जिससे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ गए हैं।
इन घटनाओं में एक समानता यह है कि अधिकतर हिंसा मरीज की मौत या हालत बिगड़ने पर हुई, जिससे भावनाएं भड़क गईं और मामला हिंसक हो गया।
#Medical Director Dr. Shahsawar Khan, #Hospital Director Dr. SherZaman, #Clinical Coordinator and In-charge Accident & Emergency Dr. Muhammad Shah, Security Officer and other faculty are discussing important issues of hospital security. pic.twitter.com/NLVTlZMTJU
— MTI – Hayatabad Medical Complex Peshawar (@HmcMti) July 26, 2025
डॉक्टरों की मांगें और दी गई डेडलाइन
पंजाब के डॉक्टरों ने सरकार को साफ तौर पर कहा है कि अगर अगले 7 दिनों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।
डॉक्टरों की प्रमुख मांगें हैं:
- सभी अस्पतालों में स्थायी पुलिस पोस्ट की स्थापना
- इमरजेंसी वार्ड में CCTV निगरानी
- हिंसा करने वालों पर कठोर कानूनी कार्रवाई
- डॉक्टरों के लिए ड्यूटी के दौरान सुरक्षा गार्ड की नियुक्ति
डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य आम मरीजों को नुकसान पहुंचाना नहीं है, लेकिन वे अपनी सुरक्षा को लेकर अब चुप नहीं रह सकते।
सरकार की प्रतिक्रिया: क्या वाकई कुछ बदलेगा?
डॉक्टरों के विरोध को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि डॉक्टरों की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है और इस मुद्दे पर चीफ सेक्रेटरी के नेतृत्व में उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई है।
प्रस्तावित उपायों में शामिल हैं:
- तीन स्तरीय सुरक्षा ढांचा
- संवेदनशील अस्पतालों में क्यूआरटी (Quick Response Team) की तैनाती
- हेल्पलाइन नंबर की व्यवस्था जहां डॉक्टर तुरंत सहायता मांग सकें
- मरीजों के परिजनों के लिए Awareness Program ताकि वे अस्पताल के नियमों को समझें
हालांकि, ज़मीन पर इन घोषणाओं का असर कितना होगा, यह समय बताएगा।
सुरक्षा की हकीकत: डॉक्टर क्यों महसूस करते हैं असुरक्षित?
कई डॉक्टरों ने यह बताया कि “हमें मेडिकल कॉलेज में पढ़ाया जाता है कि कैसे जान बचाई जाए, लेकिन कोई नहीं सिखाता कि जान बचाते वक्त खुद को कैसे बचाएं।”
हाल के मामलों ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ पुलिस कॉल करने या सिक्योरिटी बुलाने से कोई समाधान नहीं निकलता।
AIIMS जैसे संस्थानों तक में कोई पर्मानेंट सिक्योरिटी प्रोटोकॉल नहीं है। कई डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें ड्यूटी के दौरान अकेले काम करना पड़ता है, और यदि कोई हिंसा होती है तो कोई तत्काल बचाव नहीं होता।
इलाज पर असर: मरीज और समाज का पक्ष
सुरक्षा की यह कमी केवल डॉक्टरों को ही नहीं, मरीजों को भी प्रभावित करती है।
जब डॉक्टर भयभीत रहते हैं, तो वे खुलकर इलाज नहीं कर पाते। इसके अलावा, इलाज में देरी और मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।
कई बार मरीजों और डॉक्टरों के बीच विश्वास की कमी भी कारण बनती है। मरीजों को लगता है कि डॉक्टर लापरवाह हैं, जबकि डॉक्टरों का मानना है कि उन्हें बिना वजह दोषी ठहराया जाता है।
इसी संदर्भ में पंजाब पुलिस ने हाल ही में एक बड़ा हथियार और ड्रग्स तस्करी रैकेट को पकड़ा है, जिससे राज्य में बढ़ते अपराध और अस्पतालों में सुरक्षा से जुड़े खतरे उजागर हुए हैं। 👉 पढ़ें पूरी रिपोर्ट
समाधान की दिशा और आगे का रास्ता
डॉक्टरों की सुरक्षा एक ऐसा मुद्दा है जिसे टालना अब संभव नहीं।
सरकार ने भले ही आश्वासन दे दिया हो, लेकिन जब तक ये वादे ज़मीन पर नहीं उतरते, तब तक डॉक्टरों का गुस्सा शांत नहीं होगा।
आगे का रास्ता यही है:
- कानून में बदलाव लाकर अस्पतालों में हिंसा को गैर-जमानती अपराध बनाया जाए
- मरीजों और उनके परिजनों के लिए काउंसलिंग और जानकारी कार्यक्रम चलाए जाएं
- समाज में डॉक्टरों की भूमिका और सीमाएं समझाई जाएं
एक ओर सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, वहीं समाज को भी यह समझना होगा कि डॉक्टर इलाज करते हैं, चमत्कार नहीं।
🤔 क्या आप मानते हैं कि अस्पतालों में डॉक्टरों को और अधिक सुरक्षा दी जानी चाहिए?
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