जुलाई 2026 के आखिरी दिनों में भारत की शिक्षा व्यवस्था फिर से चर्चा के केंद्र में आ गई। NEET-UG सहित कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोपों के बाद देशभर में छात्र सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनों का दबाव इतना बढ़ा कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। ठीक अगले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अहम फैसला सुनाया। उन्होंने परीक्षा सुधारों के लिए एक हाई-पावर्ड टास्क फोर्स गठित करने की घोषणा की और उसका नेतृत्व इन्फोसिस के सह-संस्थापक तथा आधार परियोजना के मुख्य शिल्पकार Nandan Nilekani को सौंपा।
यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था। यह उन लोगों के लिए एक संदेश था जो सालों से परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे थे। नंदन नीलेकणि वह नाम हैं जिन्होंने पहले भी भारत को डिजिटल पहचान दी, भुगतान व्यवस्था को क्रांतिकारी बनाया और बड़े पैमाने की तकनीकी व्यवस्थाओं को जमीन पर उतारा। अब वही अनुभव परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने में इस्तेमाल होगा।
यह लेख Nandan Nilekani की पूरी जीवन यात्रा, उनकी प्रमुख उपलब्धियों, नए टास्क फोर्स की संरचना और इस फैसले के संभावित प्रभावों को विस्तार से पेश करता है। पूरी सामग्री ताजा घटनाक्रम और उनके लंबे सार्वजनिक जीवन पर आधारित है।
Nandan Nilekani का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
Nandan Nilekani का जन्म 2 जून 1955 को बेंगलुरु में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से कर्नाटक के सिरसी इलाके से था। पिता मोहन राव नीलेकणि मैसूर और मिनर्वा मिल्स में जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। परिवार में फाबियन समाजवादी विचारों का प्रभाव था। सामाजिक न्याय, समानता और सुधार की बातें घर में आम थीं। इन बातों ने नंदन के सोचने के तरीके को गढ़ा।
उन्होंने बिशप कॉटन बॉयज स्कूल और धारवाड़ के सेंट जोसेफ हाई स्कूल में पढ़ाई की। बाद में वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे पहुंचे। वहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की। आईआईटी के दिनों में ही उनकी मुलाकात रोहिणी से हुई। बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। आज रोहिणी नीलेकणि भी प्रसिद्ध परोपकारी, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दंपति के दो बच्चे हैं।
नंदन की मातृभाषा कोंकणी है। वे कन्नड़, अंग्रेजी, मराठी और हिंदी भी सहजता से बोलते हैं। युवावस्था से ही वे तकनीक को सिर्फ मुनाफे का साधन नहीं, बल्कि समाज बदलने का औजार मानते रहे।
इन्फोसिस की शुरुआत और विकास
1978 में Nandan Nilekani मुंबई की पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स में शामिल हुए। वहीं उनकी मुलाकात एन.आर. नारायण मूर्ति से हुई। दोनों ने मिलकर काम किया और 1981 में मूर्ति, नीलेकणि तथा पांच अन्य साथियों ने पटनी छोड़कर अपनी कंपनी शुरू करने का फैसला किया। इस तरह इन्फोसिस का जन्म हुआ।
शुरुआत बेहद मामूली थी। सीमित पूंजी, छोटे से स्थान और बड़े सपनों के साथ। नंदन ने कंपनी में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। वे मैनेजिंग डायरेक्टर, प्रेसिडेंट और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर रहे। मार्च 2002 से अप्रैल 2007 तक वे मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहे। इस दौरान इन्फोसिस का राजस्व लगभग छह गुना बढ़ गया और कंपनी वैश्विक स्तर पर पहचानी जाने लगी।
उन्होंने पारदर्शिता, स्केलेबिलिटी और मजबूत कॉरपोरेट गवर्नेंस पर जोर दिया। 2007 में उन्होंने सीईओ का पद छोड़ दिया, लेकिन कंपनी से जुड़े रहे। 2017 में जब इन्फोसिस में नेतृत्व संकट पैदा हुआ, तो वे नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के रूप में वापस लौटे। उन्होंने पावर सेंटर को फिर से बेंगलुरु में केंद्रित किया और कंपनी को स्थिरता प्रदान की। आज भी वे इन्फोसिस के चेयरमैन हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में कंपनी की दिशा तय करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि एआई कंपनियों को खत्म नहीं करेगा, बल्कि उन कंपनियों को और मजबूत बनाएगा जो तेजी से बदलती परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा लेती हैं।
आधार परियोजना: एक ऐतिहासिक कदम
2009 में Nandan Nilekani ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने इन्फोसिस छोड़कर सरकार में शामिल होने का निर्णय किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निमंत्रण पर वे यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया के संस्थापक चेयरमैन बने। यह पद कैबिनेट मंत्री के समकक्ष था।
आधार की मूल अवधारणा बहुत सरल थी, लेकिन उसका प्रभाव विशाल था। हर भारतीय निवासी को एक अनोखा 12 अंकों का नंबर देना, जो उसकी बायोमेट्रिक जानकारी पर आधारित हो। उंगलियों के निशान और आंखों की पुतली की स्कैनिंग के जरिए यह पहचान सुनिश्चित की गई। शुरुआत में कई चुनौतियां थीं। गोपनीयता के सवाल, तकनीकी सीमाएं, बड़े पैमाने पर नामांकन की कठिनाई। लेकिन नंदन और उनकी टीम ने इसे आबादी के पैमाने पर लागू कर दिखाया।
आज 130 करोड़ से अधिक लोग आधार से जुड़े हैं। इसने प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, बैंकिंग सेवाओं, कर व्यवस्था, डिजिटल भुगतान और कल्याण योजनाओं को आसान बनाया। आधार भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव बन गया। विश्व स्तर पर इसे सबसे बड़े और सबसे परिष्कृत पहचान कार्यक्रमों में गिना जाता है।
यूपीआई और अन्य डिजिटल योगदान
आधार के बाद Nandan Nilekani ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के सलाहकार रहे और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस के विकास में योगदान दिया। यूपीआई आज दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम बन चुका है। इसने छोटे व्यापारियों, आम नागरिकों और ग्रामीण क्षेत्रों तक डिजिटल भुगतान की पहुंच बनाई।
उन्होंने अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क, ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स और अन्य खुले नेटवर्क प्रोजेक्ट्स में भी भूमिका निभाई। हाल के वर्षों में वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जन-उपयोगी अनुप्रयोगों पर जोर दे रहे हैं। खासकर कृषि, शिक्षा और भारतीय भाषाओं में एआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात करते हैं। उनका मानना है कि भारत एआई के प्रसार में दुनिया का नेतृत्व कर सकता है, बशर्ते ध्यान आम आदमी की वास्तविक समस्याओं पर केंद्रित रहे।
वे एकस्टेप फाउंडेशन के चेयरमैन भी हैं। यह संगठन बच्चों की बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान सुधारने पर काम करता है। परोपकार के क्षेत्र में भी वे सक्रिय हैं। उन्होंने और उनकी पत्नी ने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा समाज कल्याण के लिए दान करने का वादा किया है।
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परीक्षा सुधार टास्क फोर्स का गठन
26 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो संदेश के जरिए घोषणा की कि परीक्षा सुधारों के लिए एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स का गठन किया जा रहा है। इसका नेतृत्व नंदन नीलेकणि करेंगे। यह घोषणा NEET-UG विवाद और छात्रों के व्यापक विरोध प्रदर्शनों के ठीक बाद आई।
टास्क फोर्स में निम्नलिखित विशेषज्ञ शामिल हैं:
- Nandan Nilekani (अध्यक्ष)
- पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ
- पूर्व इंटेलिजेंस ब्यूरो निदेशक तपन डेका
- आईआईटी मद्रास निदेशक वी. कामाकोटी
- पूर्व शिक्षा सचिव अनिता करवाल
- लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा
समिति का मुख्य उद्देश्य परीक्षा प्रणाली को लीक-प्रूफ, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाना है। प्रश्न पत्र तैयार करने से लेकर केंद्रों के प्रबंधन, उम्मीदवारों की पहचान सत्यापन और परीक्षा के बाद की प्रक्रिया तक पूरे चक्र की समीक्षा की जाएगी। मानव हस्तक्षेप को कम करके सुरक्षा बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में संरचनात्मक बदलाव के सुझाव भी दिए जा सकते हैं।
Nandan Nilekani का अनुभव बड़े पैमाने की तकनीकी व्यवस्थाएं बनाने का है। आधार जैसी जटिल परियोजना को उन्होंने सफलतापूर्वक लागू किया था। अब उसी अनुभव का इस्तेमाल परीक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में भरोसा बहाल करने के लिए किया जाएगा।
इस फैसले का महत्व और आने वाली चुनौतियां
परीक्षा पेपर लीक की घटनाएं भारत की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल खड़े करती रही हैं। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद अनिश्चितता का सामना करते हैं। सरकार ने फास्ट-ट्रैक अदालतों और सख्त कानूनी प्रावधानों की बात कही है। लेकिन लंबे समय का समाधान सिर्फ सजा में नहीं, बल्कि सिस्टम सुधार और तकनीक के सही इस्तेमाल में है।
Nandan Nilekani की नियुक्ति से यह उम्मीद जगी है कि समाधान केवल दंडात्मक नहीं होगा। वे डिजिटल पहचान, सुरक्षित प्रश्न पत्र ट्रांसमिशन, बायोमेट्रिक या अन्य आधुनिक प्रमाणीकरण तरीकों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी जैसे विकल्पों पर काम कर सकते हैं। साथ ही गोपनीयता और समावेशन का ध्यान रखना भी जरूरी होगा।
यह फैसला यह भी दर्शाता है कि तकनीक विशेषज्ञों को नीति निर्माण में जगह दी जा रही है। विभिन्न सरकारों के साथ काम करने का अनुभव नंदन नीलेकणि के पास है। वे राजनीति में भी सक्रिय रहे। 2014 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु साउथ से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। उसके बाद उनका फोकस हमेशा समाधान और निर्माण पर रहा।
भविष्य की संभावनाएं
Nandan Nilekani अब सत्तर वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा और दृष्टि अभी भी वैसी ही है। वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और भारत मॉडल के वैश्विक विस्तार पर काम कर रहे हैं। परीक्षा सुधार टास्क फोर्स उनकी यात्रा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है।


















