Karnataka की राजनीति में शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरे राज्य की सियासी हवा को एक बार फिर बदल दिया। योजना और सांख्यिकी मंत्री बी. नागेंद्र ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। यह उनका दूसरा इस्तीफा था और दोनों बार एक ही मुद्दा केंद्र में था—कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े कथित घोटाले के आरोप। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भावुक होते हुए आंसू बहाते नागेंद्र ने कहा कि वे पार्टी और सरकार को किसी भी तरह की शर्मिंदगी से बचाने के लिए खुद अपनी मर्जी से पद छोड़ रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि वाल्मीकि कॉर्पोरेशन के किसी भी लेन-देन में उनके हस्ताक्षर नहीं हैं और उन्हें सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे आदिवासी समुदाय से आते हैं।
नागेंद्र का यह कदम विपक्ष के लगातार दबाव, विधानसभा में दिनों-दिन बढ़ते व्यवधान और सीबीआई तथा प्रवर्तन निदेशालय की जांच के बीच आया। वे 3 अगस्त 2026 को कैबिनेट में फिर से शामिल हुए थे। महज 25 दिनों बाद उनका इस्तीफा शिवकुमार सरकार के लिए पहला बड़ा झटका साबित हुआ। यह घटना सिर्फ एक मंत्री के जाने तक सीमित नहीं है। इसमें राजनीतिक जवाबदेही, केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका, जातिगत राजनीति और राज्य की विकास एजेंडे के बीच गहरे टकराव के कई आयाम छिपे हैं।
घटना की पूरी पृष्ठभूमि और कैसे शुरू हुआ पूरा मामला
कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े आरोप सबसे पहले मई 2024 में सामने आए थे। निगम के लेखा अधीक्षक पी. चंद्रशेखरन की आत्महत्या के बाद पूरा मामला उजागर हुआ। उन्होंने एक विस्तृत नोट में लिखा था कि निगम के फंड को अनधिकृत रूप से ट्रांसफर किया जा रहा था और उन पर दबाव डाला जा रहा था। जांच में करीब 89.63 करोड़ रुपये के अवैध ट्रांसफर का खुलासा हुआ। कुल मिलाकर लगभग 187 करोड़ रुपये का फंड इस पूरे प्रकरण में शामिल बताया गया। इनमें से कुछ राशि राज्य के खजाने से गंगा कल्याण योजना के तहत आई थी।
उस समय नागेंद्र सिद्धारमैया सरकार में अनुसूचित जनजाति कल्याण, युवा सशक्तिकरण और खेल मंत्री थे। जून 2024 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। बीजेपी ने उस समय राजभवन तक मार्च निकाला और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा। बाद में ईडी ने नागेंद्र को गिरफ्तार किया, तीन महीने जेल में रखा और बाद में जमानत मिली। सीबीआई ने जून 2026 में विस्तृत चार्जशीट दाखिल की, जिसमें नागेंद्र समेत करीब 30 लोगों को आरोपी बनाया गया। एजेंसी का आरोप है कि फंड फर्जी चेक, आरटीजीएस लेन-देन और लगभग 600 बैंक खातों के जरिए लेयर्ड किए गए। कुछ राशि सोना, नकदी और लक्जरी वाहनों में बदल दी गई। ईडी ने यहां तक आरोप लगाया कि करीब 20 करोड़ रुपये 2024 लोकसभा चुनाव और नागेंद्र के निजी खर्चों में इस्तेमाल हुए।
शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद 3 अगस्त को नागेंद्र को फिर से कैबिनेट में जगह मिली। योजना और सांख्यिकी विभाग सौंपा गया। विपक्ष बीजेपी और जेडी(एस) ने तुरंत विरोध शुरू कर दिया। विधानसभा सत्र में लगातार व्यवधान डाला गया। कई बिल बिना बहस के पास हो गए। विपक्ष ने रायचूर से बल्लारी तक 170 किलोमीटर की पदयात्रा का ऐलान भी किया था, जो 1 सितंबर से शुरू होने वाली थी। नागेंद्र का इस्तीफा ठीक उसी दबाव के बीच आया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में नागेंद्र ने क्या-क्या कहा
विदाना सौधा में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नागेंद्र पूरी तरह भावुक हो गए। आंसू पोंछते हुए उन्होंने कहा, “आज मैं स्वेच्छा से मंत्री पद से इस्तीफा दे रहा हूं। मैं पार्टी को किसी भी शर्मिंदगी में नहीं डालना चाहता। मेरा मुख्यमंत्री भी मानता है कि मैंने कोई गलती नहीं की है। विकास और मुख्यमंत्री की दृष्टि बाधित नहीं होनी चाहिए। एक निर्दोष व्यक्ति को आरोपी बना दिया गया है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि वाल्मीकि कॉर्पोरेशन के किसी भी लेन-देन में उनके हस्ताक्षर नहीं हैं, न ही उन्होंने कोई निर्देश दिया या कोई नोटशीट लिखी। उन्होंने राज्यपाल द्वारा अभियोजन की मंजूरी का भी जिक्र किया और कहा कि यह चयनित तरीके से दी गई है। उन्होंने पूछा कि जब यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का नाम आया तो केंद्रीय वित्त मंत्री ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया। नागेंद्र ने रामayana का हवाला देते हुए कहा कि जैसे राम ने शंबूक को मारा, वैसे ही “मनुवादी” ताकतें आदिवासी को ऊपर नहीं उठने देना चाहतीं। उन्होंने विधायकी से भी इस्तीफे की बात कही और चुनौती दी कि बल्लारी ग्रामीण (एसटी आरक्षित) सीट पर चुनाव लड़कर मुकाबला करें।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके साथ मंत्री अजय सिंह, रिजवान अरशद और सांसद नासिर हुसैन तथा जी.सी. चंद्रशेखर भी मौजूद थे। मुख्यमंत्री शिवकुमार ने कहा कि वे हाईकमान से सलाह करके फैसला लेंगे।
वाल्मीकि निगम क्या है और इसका इतिहास
कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम राज्य सरकार की एक संस्था है जिसका उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक और सामाजिक उत्थान के लिए योजनाएं चलाना है। गंगा कल्याण जैसी योजनाओं के तहत सिंचाई, आवास, शिक्षा और रोजगार से जुड़े काम होते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस निगम के कामकाज पर कई सवाल उठे हैं। फंड के दुरुपयोग के आरोप पहले भी लगते रहे हैं, लेकिन 2024 का मामला सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से संवेदनशील साबित हुआ।
जांच एजेंसियों का कहना है कि निगम का बैंक खाता बिना उचित अनुमति के एमजी रोड शाखा में शिफ्ट किया गया। वहां से बड़े पैमाने पर ट्रांसफर हुए। शेल कंपनियों, आईटी कंपनियों और हैदराबाद स्थित एक सहकारी बैंक के खातों में पैसा घुमाया गया। सीबीआई ने आरोप लगाया कि नागेंद्र के करीबी सहयोगी नेक्कांती नागराज और निगम के तत्कालीन प्रबंध निदेशक पद्मनाभ जे.जी. इस साजिश में शामिल थे। नागेंद्र पर एक निजी फर्म को ठेका देने के बदले 1.20 करोड़ रुपये रिश्वत लेने का भी आरोप लगाया गया।
नागेंद्र का राजनीतिक सफर
बी. नागेंद्र बल्लारी ग्रामीण से चार बार विधायक चुने जा चुके हैं। वे आदिवासी समुदाय से आते हैं और लंबे समय से कांग्रेस के सक्रिय नेता रहे हैं। सिद्धारमैया सरकार में वे महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे थे। 2024 में इस्तीफे के बाद भी पार्टी ने उनका साथ नहीं छोड़ा। शिवकुमार सरकार में उन्हें फिर से जगह देना इस बात का संकेत था कि पार्टी उन्हें निर्दोष मानती है। लेकिन विपक्ष के दबाव ने स्थिति बदल दी।
नागेंद्र ने हमेशा दावा किया कि वे साजिश के शिकार हैं। उन्होंने कहा कि राज्य की एसआईटी और सीआईडी की जांच में उनका सीधा रोल नहीं मिला था। केंद्रीय एजेंसियां बाद में आईं और उन्हें जेल भेज दिया गया। जमानत मिलने के बाद भी वे सक्रिय रहे और कैबिनेट में वापसी की।
विपक्ष का आंदोलन और रणनीति
बीजेपी और जेडी(एस) ने नागेंद्र की कैबिनेट में वापसी का शुरू से विरोध किया। विधानसभा सत्र में लगातार नारेबाजी और व्यवधान डाला गया। विपक्षी नेता आर. अशोक ने सदन में कहा कि पिछली सरकार ने भी माना था कि घोटाला हुआ है। बीजेपी राज्य अध्यक्ष ने कहा कि नागेंद्र छोटा मछली है, बड़े व्हेल अभी बाहर हैं। पदयात्रा का ऐलान दबाव बढ़ाने के लिए किया गया था। इस्तीफे के बाद भी बीजेपी ने कहा कि आंदोलन जारी रहेगा क्योंकि सिर्फ इस्तीफे से न्याय नहीं मिलता।
विपक्ष का आरोप है कि फंड का इस्तेमाल 2024 लोकसभा चुनाव में हुआ। वे इसे कांग्रेस की व्यवस्थागत भ्रष्टाचार की मिसाल बता रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस इसे राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बता रही है।
कांग्रेस और शिवकुमार सरकार की स्थिति
डी.के. शिवकुमार जून 2026 में मुख्यमंत्री बने। उनका पहला बड़ा कैबिनेट विस्तार अगस्त में हुआ जिसमें 19 मंत्री शामिल हुए। नागेंद्र उनमें से एक थे। कैबिनेट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व न होने पर पहले से सवाल उठ रहे थे। अब एक जगह खाली होने से नई संभावनाएं खुल सकती हैं। हाईकमान की भूमिका बढ़ेगी। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की सलाह महत्वपूर्ण होगी।
पार्टी के अंदर कुछ नेता नागेंद्र के साथ खड़े दिखे, जबकि कुछ चुप रहे। शिवकुमार ने पहले कहा था कि आधिकारिक रिपोर्ट में नागेंद्र का रोल नहीं मिला था। अब इस्तीफा स्वीकार करने या न करने का फैसला हाईकमान के हाथ में है। सरकार को सूखा घोषणा, कास्तुरीरंगन रिपोर्ट पर विशेष सत्र और अन्य मुद्दों से भी निपटना है। राजनीतिक अस्थिरता विकास कार्यों को प्रभावित कर सकती है।
जाति, आदिवासी राजनीति और सामाजिक आयाम
नागेंद्र का आरोप है कि उन्हें जाति के आधार पर निशाना बनाया गया। कर्नाटक में आदिवासी और दलित राजनीति लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। बल्लारी क्षेत्र में खनन, भूमि अधिकार और आदिवासी मुद्दे हमेशा चर्चा में रहते हैं। एक आदिवासी नेता का मंत्री पद से दो बार इस्तीफा इस सवाल को उठाता है कि सत्ता में आने वाले पिछड़े समुदायों के नेताओं पर कैसे दबाव बनता है।
कुछ सामाजिक संगठन इस घटना को मनुवादी मानसिकता से जोड़कर देख रहे हैं। दूसरी ओर विपक्ष कहता है कि भ्रष्टाचार का कोई जाति नहीं होती। यह बहस राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चलेगी। आदिवासी समुदाय की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में साफ होगी।
जांच एजेंसियों की भूमिका और कानूनी पहलू
सीबीआई और ईडी दोनों सक्रिय रहे। ईडी ने पहले चार्जशीट दाखिल की थी जिसमें नागेंद्र को मास्टरमाइंड बताया गया। सीबीआई ने जून 2026 में विस्तृत चार्जशीट लगाई। आरोपों में फंड का डायवर्जन, शेल कंपनियों का इस्तेमाल, सोना और नकदी में रूपांतरण शामिल है। राज्यपाल ने अभियोजन की मंजूरी दी, जिसने दबाव बढ़ाया।
नागेंद्र लगातार इनकार करते रहे। उन्होंने पूछा कि बैंक अधिकारियों और अन्य लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। कानूनी प्रक्रिया लंबी चलेगी। अदालत में सबूतों की जांच होगी। जमानत की शर्तें और आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होंगी।
जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर इस घटना ने व्यापक चर्चा छेड़ दी। कुछ लोग नागेंद्र के आंसुओं को राजनीतिक नाटक बता रहे हैं, तो कुछ उनकी पीड़ा से सहमत दिख रहे हैं। बल्लारी और आसपास के क्षेत्रों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं। कुछ स्थानीय नेता उनके समर्थन में उतरे हैं, जबकि विपक्षी कार्यकर्ता जश्न मना रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह घटना शिवकुमार सरकार की छवि को प्रभावित कर सकती है। एक ओर जवाबदेही का संदेश जाता है, दूसरी ओर आदिवासी प्रतिनिधित्व का सवाल उठता है। विकास बनाम राजनीति का विमर्श भी तेज होगा।
आगे की राह और संभावित प्रभाव
नागेंद्र ने कहा है कि वे निर्दोष साबित करेंगे। विपक्ष पदयात्रा और अन्य आंदोलन जारी रखने की बात कर रहा है। कानूनी प्रक्रिया लंबी चलेगी। कैबिनेट में खाली जगह को भरने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। महिला मंत्री लाने की चर्चा तेज हो सकती है। हाईकमान की भूमिका निर्णायक होगी।
यह मामला सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं। यह राजनीतिक जवाबदेही, एजेंसियों की भूमिका, जातिगत राजनीति और राज्य की विकास एजेंडे के बीच टकराव को दर्शाता है। कर्नाटक की राजनीति में ऐसे मुद्दे अक्सर बड़े प्रभाव छोड़ते हैं। आने वाले हफ्तों में विधानसभा सत्र, पदयात्रा और कानूनी सुनवाई इस घटनाक्रम को और दिशा देंगे।
सरकार को अब साबित करना होगा कि वह विकास और सुशासन पर फोकस कर रही है। विपक्ष को भी यह दिखाना होगा कि उसका विरोध सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि वास्तविक मुद्दों पर आधारित है। जनता इन दोनों पक्षों को करीब से देख रही है। बी. नागेंद्र का इस्तीफा कर्नाटक की सियासत में एक नया अध्याय लिख गया है, जिसका असर लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है।


















