Jharkhand की राजधानी रांची इन दिनों सिर्फ राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के भविष्य की लड़ाई का मैदान बन चुकी है। जेपीएससी (Jharkhand Public Service Commission) और जेएसएससी (Jharkhand Staff Selection Commission) की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और भ्रष्टाचार के आरोपों ने पूरे राज्य को हिला दिया है। हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार के खिलाफ छात्रों का यह आंदोलन 17वें दिन भी जारी है। 10 अगस्त 2026 को हजारों नौकरी चाहने वाले युवा विधानसभा की ओर कूच कर गए। पुलिस ने वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। कई छात्र घायल हुए। उसी दिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का 51वां जन्मदिन भी था।
यह सिर्फ एक परीक्षा विवाद नहीं है। यह युवाओं के भरोसे, सरकारी भर्ती व्यवस्था की पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल है। सरकार कहती है कि उसने 98 प्रतिशत मांगें मान ली हैं। छात्र कहते हैं कि असली मांग – सीबीआई जांच – अभी भी अधूरी है। भाजपा ने पुलिस कार्रवाई के विरोध में 11 अगस्त को झारखंड बंद का आह्वान किया। ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू कर दी। सीआईडी ने पूर्व जेपीएससी चेयरमैन एल. खियांगते को गिरफ्तार कर लिया। तीन जेपीएससी सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। पूरा माहौल तनावपूर्ण है।
आंदोलन की जड़ें: कब और कैसे शुरू हुआ यह संघर्ष?
Jharkhand में सरकारी नौकरी युवाओं के लिए सबसे बड़ा सपना है। खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के बच्चे सालों की मेहनत के बाद जेपीएससी या जेएसएससी की परीक्षा देते हैं। लेकिन बार-बार परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आती रही हैं। 14वीं जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोप सबसे ताजा और गंभीर हैं। इसके अलावा जेएसएससी की सीजीएल, जेई और पीजीटी जैसी परीक्षाओं में भी सवाल उठे।
छात्रों का कहना है कि निजी एजेंसी टीडीपीएल (TSR Data Processing Pvt Ltd) के जरिए हुई कई परीक्षाओं में गड़बड़ी हुई। पेपर लीक हुए, नकल माफिया सक्रिय रहे और योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिला। जेपीएससी-जेएसएससी सुधार मंच, जेएलकेएम और अन्य छात्र संगठन पिछले कई दिनों से जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम पर धरना दे रहे थे। छात्र नेता रविंद्र पासवान और अन्य नेताओं ने साफ कहा कि सिर्फ तीन परीक्षाएं रद्द करने से काम नहीं चलेगा। वे 13 परीक्षाओं को रद्द करने और स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं।
देवेंद्र नाथ महतो नौ दिन से अनशन पर थे। स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद वे एम्बुलेंस में विधानसभा मार्च में शामिल हुए। उनके हाथ में शिबू सोरेन की तस्वीर थी। यह भावनात्मक दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैला। छात्र कह रहे थे – “हमारा भविष्य दांव पर है, हम पीछे नहीं हटेंगे।”
सरकार की प्रतिक्रिया: बातचीत के कई दौर, लेकिन गतिरोध कायम
हेमंत सोरेन सरकार ने छात्रों से कई दौर की बातचीत की। उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार, दीपिका पांडे सिंह, संजय प्रसाद यादव और चमरा लिंडा वाली समिति छात्रों से मिली। सरकार का दावा है कि उसने ज्यादातर मांगें मान ली हैं:
- 14वीं जेपीएससी परीक्षा और 2023 तथा 2025 की बैकलॉग परीक्षाएं रद्द करने पर सहमति।
- सीआईडी जांच जारी रहेगी। वित्तीय अनियमितताओं के सबूत मिलने पर ईडी जांच की सिफारिश।
- 90 दिनों के अंदर चार्जशीट दाखिल करने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट।
- जेपीएससी और जेएसएससी के कामकाज में सुधार के लिए आईआईटी-आईएसएम धनबाद, आईआईएम रांची और एक्सएलआरआई जमशेदपुर के विशेषज्ञों की समिति।
- “संवाद” नाम का प्लेटफॉर्म शुरू करने का ऐलान, जहां छात्र और नागरिक शिक्षा सुधार के सुझाव दे सकें।
मंत्री सुदिव्य कुमार ने विधानसभा में कहा कि सरकार ने हर संभव कोशिश की। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि उसने छात्र आंदोलन को हाईजैक कर लिया और गुमराह किया। उनके मुताबिक छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे थे, लेकिन राजनीतिक तत्वों ने इसे हिंसा की ओर मोड़ने की कोशिश की। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हिंसा हुई तो भाजपा के “अराजक तत्व” जिम्मेदार होंगे।
सरकार का तर्क है कि जेएसएससी सीजीएल परीक्षा कोर्ट की निगरानी में हुई थी, इसलिए उसे रद्द करने का अधिकार राज्य सरकार के पास नहीं है। जो परीक्षाएं पूरी हो चुकी हैं और नियुक्तियां हो गई हैं, उन्हें रद्द करना कानूनी रूप से मुश्किल है।
छात्र इन तर्कों से संतुष्ट नहीं हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ सीआईडी जांच पर्याप्त नहीं। उन्हें स्वतंत्र और बाहरी एजेंसी – सीबीआई या बाहर के हाईकोर्ट जजों का पैनल – चाहिए। उनका डर है कि राज्य की एजेंसियां दबाव में आकर पूरी सच्चाई नहीं निकाल पाएंगी।
10 अगस्त का विधानसभा मार्च: तनाव चरम पर
10 अगस्त को हजारों छात्र पुरानी विधानसभा बिल्डिंग के बाहर से नए विधानसभा परिसर की ओर बढ़े। तिरंगे और प्लेकार्ड लिए वे नारे लगा रहे थे – “जेएसएससी-सीजीएल रद्द करो या सीबीआई जांच करो”, “जेएसएससी पर छापा क्यों नहीं?”, “निष्पक्ष जांच हो, सच्चाई सामने आए”।
पुलिस ने भारी सुरक्षा व्यवस्था की थी। 1500 से ज्यादा जवान तैनात थे। रैपिड एक्शन फोर्स, आईआरबी और क्यूआरटी के जवान मौजूद थे। विधानसभा के 750 मीटर के दायरे में धारा 163 लागू थी। कंटीले तार लगाए गए थे। स्कूल बंद रखे गए।
छात्रों ने कई बैरिकेड तोड़े। पुलिस ने वाटर कैनन चलाए, आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया। दोनों तरफ से चोटें आईं। पुलिस का कहना है कि 14 जवान पथराव में घायल हुए। छात्रों का आरोप है कि कई लड़कियों सहित दर्जनों युवा घायल हुए। कुछ को अस्पताल ले जाया गया।
उसी दिन भाजपा नेता आदिता साहू और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री आवास के बाहर अलग प्रदर्शन कर रहे थे। कई भाजपा नेताओं को हिरासत में लिया गया या नजरबंद रखा गया।
जांच और गिरफ्तारियां: क्या हो रहा है जमीनी स्तर पर?
आंदोलन के दौरान जांच भी तेज हुई। सीआईडी ने पूर्व जेपीएससी चेयरमैन एल. खियांगते को गिरफ्तार किया। वे 1988 बैच के आईएएस अधिकारी और पूर्व मुख्य सचिव रह चुके हैं। फरवरी 2025 में जेपीएससी चेयरमैन बने थे और जुलाई में इस्तीफा दे चुके थे। उनकी गिरफ्तारी के साथ कुल गिरफ्तारियों की संख्या 20 के आसपास पहुंच गई। इससे पहले जेपीएससी अध्यक्ष समेत कई लोगों पर कार्रवाई हो चुकी थी। डिजिटल और दस्तावेजी सबूत जब्त किए गए।
ईडी ने भी मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से जांच शुरू कर दी, खासकर जेएसएससी-सीजीएल से जुड़े मामलों में। गवर्नर संतोष कुमार गंगवार ने तीन जेपीएससी सदस्यों – अजीता भट्टाचार्य, अनीमा हांस्दा और जमाल अहमद – के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। अजीता भट्टाचार्य जेएमएम नेता सुप्रियो भट्टाचार्य की पत्नी हैं।
ये विकास छात्र आंदोलन को और बल दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि अगर इतनी गिरफ्तारियां हो रही हैं तो पूरी जांच सीबीआई को सौंप क्यों नहीं दी जाती?
राजनीतिक समीकरण: सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप
यह मुद्दा अब पूरी तरह राजनीतिक हो चुका है। सत्ताधारी जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन इसे छात्र आंदोलन बता रहा है जिसे भाजपा ने अपना बना लिया। विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार का प्रमाण बता रहा है।
भाजपा ने 11 अगस्त को झारखंड बंद का ऐलान किया। पुलिस कार्रवाई को “अत्याचार” करार दिया। एबीवीपी ने भी विधानसभा घेराव की तैयारी की। संसद में भी इस मुद्दे पर हंगामा हुआ।
सरकार बार-बार दोहरा रही है कि वह युवाओं के साथ है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने “संवाद” प्लेटफॉर्म का ऐलान किया और कहा कि हर जायज मांग पूरी की जाएगी। न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए। लेकिन छात्र संगठन कह रहे हैं कि बातें काफी हो चुकीं, अब ठोस कार्रवाई चाहिए।
युवाओं का दर्द: सिर्फ नौकरी नहीं, भरोसा टूटा है
Jharkhand के युवा लंबे समय से सरकारी नौकरियों का इंतजार कर रहे हैं। परीक्षाएं देर से होती हैं, रिजल्ट में देरी होती है, फिर अनियमितताओं के आरोप लगते हैं। कई युवा सालों की तैयारी के बाद निराश हो जाते हैं। कुछ परिवार अपनी जमीन-जायदाद बेचकर बच्चों की कोचिंग करवाते हैं। जब परीक्षा में गड़बड़ी की खबर आती है तो पूरा परिवार टूट जाता है।
छात्र कहते हैं कि वे शांतिपूर्ण तरीके से लड़ रहे हैं। वे संविधान और कानून का सम्मान करते हुए अपनी बात रख रहे हैं। लेकिन जब सरकार उनकी मुख्य मांग नहीं मानती तो गुस्सा बढ़ता है। अनशन, मार्च, धरना – ये सब उसी गुस्से की अभिव्यक्ति हैं।
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सुधार की जरूरत: सिर्फ परीक्षा रद्द करना काफी नहीं
यह संकट सिर्फ एक-दो परीक्षाओं का नहीं है। पूरे भर्ती सिस्टम में सुधार की जरूरत है। विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला अच्छा है, लेकिन उसे मजबूत और स्वतंत्र बनाना होगा। पेपर लीक रोकने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, सख्त निगरानी, आउटसोर्सिंग एजेंसियों पर कड़ी नजर और समयबद्ध प्रक्रिया जरूरी है।
अन्य राज्यों में भी पेपर लीक के मामले सामने आए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर टेस्टिंग एजेंसी जैसी व्यवस्था पर चर्चा होनी चाहिए। झारखंड को इस संकट को अवसर में बदलना चाहिए। पारदर्शी, निष्पक्ष और तेज भर्ती प्रक्रिया युवाओं का भरोसा वापस ला सकती है।


















