इंदौर को भारत का सबसे स्वच्छ शहर कहा जाता है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत यह शहर कई सालों से नंबर वन पर काबिज है। लेकिन जनवरी 2026 में “Indore Water Crisis” ने इस छवि को धक्का पहुंचाया है। इंदौर मध्य प्रदेश का आर्थिक केंद्र है, जहां लाखों लोग रहते हैं। यहां की आबादी तेजी से बढ़ रही है, और इसी वजह से पानी की मांग भी बढ़ी है।
शहर की जल आपूर्ति मुख्य रूप से नर्मदा नदी से होती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर地下 जल और पाइपलाइन सिस्टम पर निर्भरता है। भगीरथपुरा इलाका, जहां यह संकट शुरू हुआ, एक घनी आबादी वाला क्षेत्र है। यहां के लोग ज्यादातर मजदूर वर्ग के हैं, जो दैनिक मजदूरी पर निर्भर हैं। दिसंबर 2025 के अंत में यहां से शिकायतें आने लगीं कि पानी में बदबू आ रही है और पीने से पेट दर्द हो रहा है। लेकिन शुरुआत में इसे गंभीरता से नहीं लिया गया।
“Indore Water Crisis” की जड़ें शहर की तेज विकास में छिपी हैं। तेजी से निर्माण कार्य, अवैध कनेक्शन और पुरानी पाइपलाइनों ने समस्या को बढ़ाया। एक रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर में 20% से ज्यादा पानी लीकेज की वजह से बर्बाद होता है। यह संकट हमें याद दिलाता है कि स्वच्छता सिर्फ सड़कों की नहीं, बल्कि पानी की भी जरूरी है।
क्या हुआ: घटनाक्रम की समयरेखा
चलिए अब विस्तार से देखते हैं कि “Indore Water Crisis” कैसे शुरू हुआ और फैला।
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दिसंबर 2025 के अंत में: भगीरथपुरा के निवासियों ने पानी में सीवेज की मिलावट की शिकायत की। कुछ लोगों को उल्टी और दस्त की समस्या हुई, लेकिन इसे सामान्य माना गया।
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1 जनवरी 2026: नए साल के पहले दिन से ही मामले बढ़ने लगे। लगभग 50 लोग अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों ने इसे पानी से जुड़ी समस्या बताया।
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2 जनवरी 2026: मौतों की संख्या बढ़ी। पहले 5 मौतें दर्ज हुईं। स्वास्थ्य विभाग ने जांच शुरू की और पाया कि पानी में ई. कोलाई बैक्टीरिया मौजूद है, जो सीवेज से आता है।
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3 जनवरी 2026: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने दौरा किया। अधिकारियों को निलंबित किया गया। मौतों की संख्या 10 पहुंची, और 200 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती।
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4 जनवरी 2026: महामारी घोषित की गई। 20 नए मामले मिले। कुल मौतें 15 हो गईं। स्वास्थ्य टीमों ने 9400 से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग की।
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5 जनवरी 2026: 38 नए मामले। 142 लोग अभी भी अस्पताल में, जिनमें 11 आईसीयू में। मौतें 16 पहुंचीं।
यह समयरेखा दिखाती है कि “Indore Water Crisis” कितनी तेजी से फैला। शुरुआती लापरवाही ने इसे बड़ा रूप दे दिया। एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हमारा पानी हमेशा साफ लगता था, लेकिन अचानक सब बीमार पड़ गए। बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।”
कारण: क्यों हुआ यह संकट?
“Indore Water Crisis” के पीछे कई कारण हैं, जो मानवीय लापरवाही और सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करते हैं।
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सीवेज की मिलावट: मुख्य कारण एक सार्वजनिक शौचालय का पाइपलाइन के ऊपर बनना है। शौचालय की लीकेज से सीवेज पानी की लाइन में मिल गया। यह इंदौर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की गलती है, जो निर्माण की अनुमति देते समय जांच नहीं की।
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पुरानी पाइपलाइन: इंदौर की कई पाइपलाइनें 20-30 साल पुरानी हैं। इनमें दरारें आ गईं, जिससे संदूषण आसान हो गया। CAG रिपोर्ट ने 2025 में ही चेतावनी दी थी कि इंदौर में पानी की गुणवत्ता में गंभीर खामियां हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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अवैध निर्माण और कनेक्शन: तेज शहरीकरण से अवैध घर और कनेक्शन बढ़े। भगीरथपुरा में कई जगहों पर सीवेज और पानी की लाइनें करीब-करीब हैं।
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जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: मध्य प्रदेश में सूखा और कम बारिश से地下 जल स्तर गिरा, जिससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित हुई। लेकिन यह मुख्य कारण नहीं।
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प्रशासनिक लापरवाही: स्वास्थ्य विभाग को शिकायतें मिलीं, लेकिन समय पर टेस्टिंग नहीं हुई। एक रिपोर्ट कहती है कि पानी के सैंपल टेस्ट में देरी हुई।
ये कारण बताते हैं कि “Indore Water Crisis” रोका जा सकता था। अगर समय पर जांच होती, तो इतनी जानें न जातीं।
प्रभाव: मानवीय और आर्थिक नुकसान
“Indore Water Crisis” का प्रभाव गहरा है। चलिए देखते हैं:
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स्वास्थ्य प्रभाव: 16 मौतें, 200+ अस्पताल में। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित। लक्षणों में उल्टी, दस्त, बुखार और डिहाइड्रेशन शामिल हैं। लंबे समय में किडनी और लीवर की समस्याएं हो सकती हैं।
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आर्थिक नुकसान: प्रभावित इलाकों में काम बंद। मजदूर वर्ग प्रभावित, दैनिक आय रुकी। अस्पतालों पर बोझ बढ़ा। सरकार को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़े टैंकर और दवाओं पर।
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सामाजिक प्रभाव: लोगों में डर। स्वच्छ शहर की छवि खराब। राजनीतिक तनाव बढ़ा। कांग्रेस ने BJP सरकार पर आरोप लगाए कि लापरवाही से मौतें हुईं।
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पर्यावरणीय प्रभाव: सीवेज मिलावट से स्थानीय जल स्रोत प्रदूषित। इससे भविष्य में और संकट आ सकता है।
एक प्रभावित परिवार की कहानी: रामलाल, एक मजदूर, ने अपनी पत्नी को खो दिया। वह कहते हैं, “हम गरीब हैं, पानी ही हमारा जीवन है। अब कैसे जिएंगे?” यह “Indore Water Crisis” की दर्दनाक सच्चाई है।
सरकार की प्रतिक्रिया: कदम और घोषणाएं
सरकार ने “Indore Water Crisis” पर तेजी से प्रतिक्रिया दी, लेकिन शुरुआती देरी की आलोचना हो रही है।
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तत्काल कदम: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भगीरथपुरा का दौरा किया। अतिरिक्त कमिश्नर को हटाया, कई अधिकारियों को सस्पेंड किया। जांच समिति गठित।
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स्वास्थ्य सहायता: मुफ्त इलाज। 142 बेड वाले अस्पताल में स्पेशल वार्ड। स्वास्थ्य टीमों ने घर-घर स्क्रीनिंग की।
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पानी की व्यवस्था: टैंकर से साफ पानी पहुंचाया। बोतलबंद पानी वितरित। पाइपलाइन की मरम्मत शुरू।
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राजनीतिक प्रतिक्रिया: BJP ने कहा कि यह विरासत में मिली समस्या है, जबकि कांग्रेस ने सरकार की नाकामी बताई। पूर्व CM कमलनाथ ने जांच की मांग की।
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केंद्र की भूमिका: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने टीम भेजी। PMO ने स्थिति पर नजर रखी।
ये कदम अच्छे हैं, लेकिन सवाल है – क्या ये पर्याप्त हैं? “Indore Water Crisis” हमें सिखाता है कि रोकथाम इलाज से बेहतर है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: आरोप-प्रत्यारोप का दौर
“Indore Water Crisis” राजनीतिक मुद्दा बन गया है।
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BJP का पक्ष: CM यादव ने कहा कि समस्या पुरानी है, लेकिन हमने तुरंत कार्रवाई की। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उनके शासन में पाइपलाइनें नहीं बदली गईं।
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कांग्रेस का हमला: नेता जीतू पटवारी ने कहा कि BJP की लापरवाही से मौतें हुईं। उन्होंने इस्तीफे की मांग की।
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अन्य पार्टियां: AAP और अन्य ने स्वतंत्र जांच मांगी।
यह राजनीति संकट को और जटिल बनाती है। लेकिन जरूरत है एकजुट होकर समाधान की।
रोकथाम के उपाय: भविष्य के लिए सबक
“Indore Water Crisis” से सीख लेकर हम ऐसी घटनाओं को रोक सकते हैं।
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नियमित जांच: पानी की गुणवत्ता की मासिक टेस्टिंग। स्मार्ट सेंसर लगाएं।
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इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड: पुरानी पाइपलाइनें बदलें। सीवेज और पानी की लाइनें अलग रखें।
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जागरूकता अभियान: लोगों को साफ पानी के महत्व के बारे में बताएं। RO फिल्टर का इस्तेमाल प्रोत्साहित करें।
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सरकारी नीतियां: राष्ट्रीय जल नीति को सख्ती से लागू करें। बजट 2026 में पानी के लिए ज्यादा फंड।
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समुदाय की भूमिका: स्थानीय समितियां बनाएं जो शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करें।




















