Trump Greenland : 2026 की शुरुआत में जब दुनिया वेनेजुएला संकट और उसके बाद के अमेरिकी हस्तक्षेप की चर्चा में डूबी हुई थी, तभी ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य है। यह बयान ऐसे समय में आया जब आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियाँ बढ़ रही हैं।
भारत में यह मुद्दा ट्रेंड इसलिए कर रहा है क्योंकि भारतीय सोशल मीडिया यूज़र्स इसे नये साम्राज्यवाद की वापसी के रूप में देख रहे हैं। ट्रंप ने हाल ही में भारत को रूस से तेल खरीदने को लेकर चेतावनी भी दी थी, जिसके बाद लोग इसे एक बड़े पैटर्न का हिस्सा मान रहे हैं। Trump Greenland की यह चर्चा अब सिर्फ़ अमेरिका-डेनमार्क का द्विपक्षीय मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा सवाल बन गया है।
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है (हालाँकि महाद्वीप नहीं), जिसकी आबादी मात्र 56,000 के करीब है। यह डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन सामरिक और आर्थिक महत्व इतना अधिक है कि बड़े देश इस पर नज़र रखे हुए हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ तेज़ी से पिघल रही है, नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और दुर्लभ खनिजों तक पहुँच आसान हो रही है। ट्रंप का कहना है कि रूसी और चीनी जहाज़ों की बढ़ती मौजूदगी से खतरा है, इसलिए ग्रीनलैंड अमेरिका के नियंत्रण में होना चाहिए।
ग्रीनलैंड का भौगोलिक और सामरिक महत्व क्यों इतना बड़ा है?
ग्रीनलैंड उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है। यह कनाडा से बहुत नज़दीक है और यूरोप-अमेरिका के बीच एक तरह का पुल का काम करता है। जलवायु परिवर्तन के चलते यहाँ की बर्फ पिघलने से नॉर्थवेस्ट पैसेज जैसे नए शिपिंग रूट खुल रहे हैं, जो एशिया से यूरोप तक का सफ़र काफी छोटा कर देंगे। व्यापारिक दृष्टि से यह बहुत बड़ा बदलाव है।
सामरिक रूप से ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है। यहाँ पर अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सैन्य अड्डा है, जहाँ से बैलिस्टिक मिसाइलों की निगरानी की जाती है। रूस की आर्कटिक में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ और चीन की आर्थिक महत्वाकांक्षाएँ ट्रंप को चिंतित कर रही हैं। Trump Greenland का मुद्दा उठाकर ट्रंप दरअसल आर्कटिक में अपना वर्चस्व मजबूत करना चाहते हैं।
इसके अलावा, ग्रीनलैंड में दुर्लभ पृथ्वी तत्व (rare earth elements) प्रचुर मात्रा में हैं, जो मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, और आधुनिक हथियार बनाने में जरूरी हैं। वर्तमान में चीन इनका लगभग 90% उत्पादन नियंत्रित करता है। अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है, और ग्रीनलैंड इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है। इस प्रकार Trump Greenland सिर्फ़ सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता का भी मुद्दा है।

ट्रंप की पुरानी दिलचस्पी: यह कहानी नई नहीं है
ट्रंप की ग्रीनलैंड में रुचि उनके पहले कार्यकाल (2017-2021) से ही जगजाहिर है। उस समय उन्होंने इसे खरीदने की इच्छा सार्वजनिक रूप से जताई थी और इसे एक तरह की “रियल एस्टेट डील” कहा था। डेनमार्क ने साफ़ इनकार कर दिया था, जिसके बाद ट्रंप ने डेनमार्क की प्रधानमंत्री के साथ निर्धारित बैठक ही रद्द कर दी थी।
वैश्विक राजनीतिक अपडेट
लेकिन यह रुचि उससे भी पुरानी है। अमेरिका ने 1946 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दिया था। 1867 में अलास्का खरीदने के साथ ही ग्रीनलैंड को भी खरीदने की कोशिश की गई थी। 1951 में दोनों देशों के बीच रक्षा समझौता हुआ, जिसके तहत अमेरिका को यहाँ सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति मिली।
2025-2026 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह मुद्दा फिर से गर्म हो गया है। उन्होंने अपने करीबियों को ग्रीनलैंड के नेताओं से संपर्क करने के लिए भेजा और आर्थिक-सामरिक लाभों का प्रस्ताव रखा। Trump Greenland अब सिर्फ़ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा लग रहा है।
वेनेजुएला संकट के बाद नया संदर्भ
वेनेजुएला में हालिया राजनीतिक उलटफेर और अमेरिकी प्रभाव के बाद ट्रंप का ग्रीनलैंड पर फोकस बढ़ गया है। कई विश्लेषक इसे एक पैटर्न के रूप में देख रहे हैं – जहाँ अमेरिका उन क्षेत्रों पर दबाव बनाता है जो सामरिक या संसाधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार के बाद अब ग्रीनलैंड के दुर्लभ खनिज और संभावित तेल-गैस भंडार लुभावने लग रहे हैं।
ट्रंप का तर्क है कि आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी से अमेरिका की सुरक्षा को खतरा है। लेकिन आलोचक इसे नया साम्राज्यवादी कदम बता रहे हैं। Trump Greenland का यह नया अध्याय वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड की प्रतिक्रिया
डेनमार्क ने ट्रंप के बयानों को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। डेनिश प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और यह उसकी संप्रभुता का मामला है। ग्रीनलैंड के स्थानीय नेता भी किसी बाहरी हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ हैं। उन्होंने विदेशी संपत्ति खरीद पर नए प्रतिबंध भी लगाए हैं।
यूरोपीय संघ ने डेनमार्क का समर्थन किया है। NATO के सदस्य होने के बावजूद डेनमार्क इस मुद्दे पर अमेरिका से अलग रुख अपना रहा है। अगर Trump Greenland पर ज़्यादा दबाव बनाते हैं, तो NATO में दरार पड़ सकती है।
भारत में ट्रेंडिंग का कारण और भारतीय दृष्टिकोण
भारत में Trump Greenland का ट्रेंड सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा के कारण है। भारतीय यूज़र्स इसे अमेरिकी वर्चस्व की नई कोशिश के रूप में देख रहे हैं। ट्रंप द्वारा भारत को रूस से तेल आयात कम करने की चेतावनी के बाद लोग इसे एक बड़े खेल का हिस्सा मान रहे हैं।
भारत आर्कटिक काउंसिल का पर्यवेक्षक सदस्य है और जलवायु परिवर्तन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में रुचि रखता है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थिरता भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नए समुद्री मार्ग व्यापार को प्रभावित करेंगे। Trump Greenland का परिणाम वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था पर असर डालेगा, जिसकी भारत हमेशा वकालत करता रहा है।
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