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Raj Thackeray का Vivek Oberoi पर तंज: अगर भारत इतना अच्छा है तो दुबई में क्यों रहते हो?

मुंबई में एमएनएस छात्र संगठन की 20वीं वर्षगांठ पर तीखा भाषण, अभिनेताओं के विदेश बसने और विकास के दावों पर बड़ा सवाल

Jyoti Rajput by Jyoti Rajput
August 3, 2026
in राजनीति
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विवेक ओबेरॉय दुबई में रहते हुए Raj Thackeray के बयान के बाद चर्चा में

विवेक ओबेरॉय दुबई में रहते हुए Raj Thackeray के बयान के बाद चर्चा में

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Raj Thackeray का विवेक ओबेरॉय पर तंज: अगर भारत इतना अच्छा है तो दुबई में क्यों रहते हो?

अगस्त 2026 की शुरुआत महाराष्ट्र की राजनीति और बॉलीवुड की चर्चा में एक नया मोड़ लेकर आई। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी एमएनएस के प्रमुख राज ठाकरे ने मुंबई में अपने छात्र संगठन महाराष्ट्र नवनिर्माण विद्यार्थी सेना के बीसवें वर्षगांठ समारोह में जो बातें कहीं, उन्होंने सिर्फ राजनीतिक गलियारों में नहीं बल्कि सोशल मीडिया, समाचार चैनलों और आम चर्चाओं में भी धूम मचा दी। उन्होंने साफ-साफ नाम लेकर सवाल पूछा – विवेक ओबेरॉय और आर. माधवन। दोनों अभिनेता सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके नेतृत्व में हो रहे विकास की तारीफ करते रहे हैं, लेकिन रहने के लिए उन्होंने दुबई को चुना है। राज ठाकरे का सीधा सवाल था – अगर आपको भारत से इतना प्यार है, अगर आपको लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी देश का विकास कर रहे हैं, तो फिर अपने परिवार के साथ विदेश में क्यों रह रहे हो?

यह बयान महज एक राजनीतिक तंज नहीं था। इसमें देश छोड़कर विदेश बसने वाले उद्योगपतियों, अभिनेताओं और युवाओं की हताशा का मिश्रण साफ दिख रहा था। राज ठाकरे ने कहा कि पिछले बारह साल में हजारों उद्योगपति और व्यापारी अपना सामान समेटकर देश छोड़ चुके हैं। फिर उन्होंने विवेक ओबेरॉय का उदाहरण दिया। 2019 में रिलीज हुई फिल्म “पीएम नरेंद्र मोदी” में विवेक ने खुद प्रधानमंत्री का किरदार निभाया था। राज ठाकरे ने कहा, “विवेक ओबेरॉय, जिन्होंने मोदी पर फिल्म बनाई और खुद मोदी का रोल किया, वे भी दुबई में रहने चले गए।” आर. माधवन के बारे में उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मोदी की तारीफ करते हैं और कहते हैं कि देश बदल गया है, वे भी दुबई में बस गए हैं। फिर सवाल दोहराया – अगर सब कुछ इतना अच्छा है तो विदेश में क्यों?

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उन्होंने आगे आरोप लगाया कि कुछ अभिनेता यहां आकर “सरकार-समर्थित” फिल्मों में काम करते हैं और फिर वापस दुबई चले जाते हैं। “धुरंधर” जैसी फिल्म का जिक्र भी उन्होंने किया। यह पूरा भाषण युवाओं से भरे कार्यक्रम में दिया गया था। राज ठाकरे वहां सिर्फ अभिनेताओं की बात नहीं कर रहे थे। वे शिक्षा व्यवस्था, शहरों की हालत, रोजगार के अवसर और युवाओं के विदेश जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी का शोर मचाया गया लेकिन शहरों की हालत खराब है। सड़कें, पार्क, खेल सुविधाएं, सफाई – ये चीजें विदेश में बेहतर दिखती हैं इसलिए युवा बाहर जाना चाहते हैं।

यह घटना 1 और 2 अगस्त 2026 के आसपास हुई। भारत टीवी, एनडीटीवी, न्यूज18, टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडिया टुडे, लाइवमिंट और कई अन्य माध्यमों ने इसे प्रमुखता से कवर किया। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने राज ठाकरे के सवाल को जायज बताया तो कुछ ने कहा कि व्यक्तिगत जीवन के फैसले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। दोनों पक्षों के तर्क अपनी जगह मजबूत लगते हैं।

raj thackeray ने विवेक ओबेरॉय के दुबई बसने पर उठाया सवाल पीएम मोदी की तारीफ के बीच
raj thackeray ने विवेक ओबेरॉय के दुबई बसने पर उठाया सवाल पीएम मोदी की तारीफ के बीच

घटना की पूरी पृष्ठभूमि और राज ठाकरे का भाषण

महाराष्ट्र नवनिर्माण विद्यार्थी सेना एमएनएस का छात्र संगठन है। इसकी बीसवीं वर्षगांठ पर मुंबई के रवींद्र नाट्य मंदिर या किसी बड़े स्थान पर कार्यक्रम आयोजित किया गया था। राज ठाकरे मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। वे युवाओं को संबोधित कर रहे थे। उनके भाषण का मुख्य फोकस युवा मुद्दों पर था – बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता, शहरों की बदहाली और विदेश जाने की चाह। इसी क्रम में उन्होंने उद्योगपतियों और सार्वजनिक चेहरों का जिक्र किया जो विकास की तारीफ तो करते हैं लेकिन खुद देश छोड़ देते हैं।

Raj Thackeray ने कहा कि हजारों उद्योगपति अपना सामान पैक करके चले गए। फिर उन्होंने बॉलीवुड की तरफ रुख किया। विवेक ओबेरॉय का नाम लेते हुए उन्होंने याद दिलाया कि इन्होंने मोदी की बायोपिक में मुख्य किरदार निभाया था। फिल्म 2019 में आई थी और चुनाव के आसपास काफी चर्चा में रही थी। कुछ लोगों ने इसे प्रचार फिल्म कहा तो कुछ ने अभिनय की तारीफ की। राज ठाकरे ने कहा कि वही विवेक ओबेरॉय अब दुबई में रहते हैं। आर. माधवन के बारे में उन्होंने कहा कि वे भी मोदी की तारीफ करते रहे हैं लेकिन दुबई में बस गए हैं। सवाल साफ था – अगर भारत इतना अच्छा बन गया है तो फिर परिवार लेकर विदेश क्यों?

उन्होंने यह भी कहा कि ये लोग यहां आकर सरकार समर्थित फिल्मों में काम करते हैं और फिर वापस चले जाते हैं। “धुरंधर” का नाम उन्होंने इसी संदर्भ में लिया। आर. माधवन इस फिल्म में रहे हैं। राज ठाकरे का इशारा साफ था कि तारीफ और फिल्म तो भारत में, लेकिन जीवन दुबई में।

इसी भाषण में उन्होंने जंतर मंतर पर हुए सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन का भी जिक्र किया। वहां प्रधानमंत्री के खिलाफ इस्तेमाल हुई गंदी भाषा की उन्होंने निंदा की। उन्होंने कहा कि ऐसी भाषा नहीं होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री से भी कहा कि वे अपने पार्टी के लोगों को भी समझाएं। यह हिस्सा भी चर्चा में रहा क्योंकि राजनीतिक बहस में गाली-गलौज आम हो गई है।

भाषण का यह हिस्सा युवाओं के बीच काफी गूंजा। कई समाचार चैनलों ने वीडियो क्लिप्स दिखाए। सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कुछ यूजर्स ने राज ठाकरे का समर्थन किया तो कुछ ने अभिनेताओं के पक्ष में तर्क दिए।

विवेक ओबेरॉय का दुबई जाना: उनके अपने शब्द

विवेक ओबेरॉय ने राज ठाकरे के इस ताजा बयान पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन उन्होंने पहले कई इंटरव्यू में दुबई जाने के कारण साफ बताए हैं। ये स्पष्टीकरण कोविड महामारी के दौरान और उसके बाद के हैं।

विवेक ने बताया कि वे कोविड के समय दुबई गए थे। शुरुआत में यह अस्थायी कदम था। परिवार के साथ चर्चा हुई। परिवार ने लोकतांत्रिक तरीके से वोट किया और रहने का फैसला लिया। उन्होंने कहा कि दुबई इतना करीब है कि घर से दूर होने का अहसास नहीं होता। सप्ताहांत या छुट्टियों में आसानी से भारत आ सकते हैं। धीरे-धीरे पिछले कुछ सालों में दुबई घर जैसा लगने लगा।

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बिजनेस के मामले में विवेक ने काफी विस्तार से बात की है। उन्होंने रियल एस्टेट और अन्य क्षेत्रों में काम शुरू किया। दुबई में बिजनेस करने की आसानी, पॉजिटिव माहौल और अवसरों ने उन्हें आकर्षित किया। रिपोर्ट्स के अनुसार उनके बिजनेस की वैल्यू काफी बढ़ गई। कुछ जगहों पर उनके नेट वर्थ का जिक्र हजार करोड़ के आसपास किया गया। उन्होंने कहा कि दुबई में स्वतंत्रता है, स्थानीय कानूनों और संस्कृति का सम्मान करो तो कोई दिक्कत नहीं। यह एक तनाव मुक्त जगह है जहां काम फल-फूल सकता है।

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विवेक ने यह भी कहा कि मुंबई अभी भी उनका असली घर है। जब वे मुंबई जाते हैं तो वापस आने का मन नहीं करता। वे दोनों जगहों का मिश्रण चाहते हैं। उनके घर में भारतीय यादें जीवित रखने की कोशिश की गई है – गुलमोहर के पेड़, करी पत्ता और सब्जियों का गार्डन, भारतीय कलाकृतियां। वे कहते हैं कि दुबई में वे “नॉन-फिल्म” जीवन जी पा रहे हैं जो मुंबई में मुश्किल था। बच्चों के साथ समय बिताना, काम से समय पर घर लौटना – ये सुविधाएं उन्हें मिलीं।

यह स्पष्टीकरण राज ठाकरे के सवाल के जवाब में तो नहीं है, लेकिन इससे समझ आता है कि विवेक का फैसला बिजनेस और परिवार की सुविधा पर आधारित था। कई भारतीय उद्यमी और प्रोफेशनल दुबई को बेस बना रहे हैं। टैक्स व्यवस्था, सुरक्षा, सुविधाएं और भारत से नजदीकी प्रमुख कारण हैं।

आर. माधवन का दुबई जाना: बेटे के करियर के लिए

आर. माधवन का मामला थोड़ा अलग है। उन्होंने साफ कहा है कि वे अपने बेटे वेदांत माधवन के स्विमिंग करियर के लिए दुबई गए। कोविड महामारी के दौरान भारत में स्विमिंग पूल बंद हो गए थे। वेदांत किशोरावस्था में था। उस उम्र में ट्रेनिंग बहुत जरूरी होती है। माधवन ने बताया कि जर्मनी, फ्रांस, चीन जैसे देशों ने पूल खोल दिए थे और खिलाड़ियों को सुरक्षित माहौल में ट्रेनिंग दे रहे थे। कुछ ने उस दौरान विश्व रिकॉर्ड भी तोड़े।

जब पता चला कि दुबई में स्विमिंग क्लासेस सख्त सुरक्षा उपायों के साथ चल रही हैं तो पत्नी सरिता बेटे को लेकर पहले चली गईं। माधवन बाद में जुड़े। उन्होंने कहा कि यह फैसला सही समय पर लिया गया। वेदांत की ट्रेनिंग जारी रही और उन्होंने अच्छी सफलता हासिल की। भारतीय स्विमिंग टीम भी उस दौरान दुबई में ट्रेनिंग कर रही थी।

आर माधवन दुबई में बेटे के स्विमिंग करियर के लिए रहने वाले अभिनेता | raj thackeray
आर माधवन दुबई में बेटे के स्विमिंग करियर के लिए रहने वाले अभिनेता | raj thackeray

माधवन ने बार-बार जोर दिया है कि उनका ज्यादातर काम भारत में ही है। लगभग नब्बे प्रतिशत काम भारत में होता है। टैक्स भी भारत में भरते हैं। साल का लगभग आधा समय वे भारत में शूटिंग में बिताते हैं। उन्होंने कहा कि पहले भारतीय हो, बाकी बाद में। यह बयान उनके जुड़ाव को दिखाता है।

राज ठाकरे के बयान के बाद माधवन की तरफ से भी कोई नई प्रतिक्रिया नहीं आई है। उनके पुराने स्पष्टीकरण अब फिर चर्चा में आ गए हैं। कई लोग कह रहे हैं कि बेटे के करियर के लिए माता-पिता का यह फैसला समझ में आता है। स्विमिंग जैसे खेल में सुविधाएं और माहौल मायने रखते हैं।

Raj Thackeray की राजनीति और इस बयान का संदर्भ

Raj Thackeray महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। वे बाल ठाकरे के भतीजे हैं और शिवसेना से अलग होकर एमएनएस बनाई। उनकी राजनीति स्थानीय भावनाओं, मराठी अस्मिता और युवा मुद्दों पर केंद्रित रही है। वे अक्सर तीखे बयान देते हैं जो सुर्खियां बनते हैं। कभी-कभी वे विपक्षी दलों के साथ मोर्चा बनाते दिखते हैं तो कभी अलग राह चुनते हैं।

इस बार का बयान उनके छात्र संगठन के कार्यक्रम में आया। युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के फर्क को उजागर किया। शहरों की हालत, शिक्षा, रोजगार – ये मुद्दे कई मध्यमवर्गीय परिवारों की चिंता हैं। राज ठाकरे ने कहा कि बच्चे बाहर जाना चाहते हैं क्योंकि यहां सुविधाएं नहीं। विदेश में सड़कें, मैदान, बगीचे, सफाई, खेल कॉम्प्लेक्स बेहतर हैं।

उद्योगपतियों के देश छोड़ने का मुद्दा भी उन्होंने उठाया। समय-समय पर खबरें आती रहती हैं कि कुछ बिजनेसमैन विदेश में बेस बना रहे हैं। कारण टैक्स, रेगुलेशन, बिजनेस एनवायरनमेंट या व्यक्तिगत सुरक्षा हो सकते हैं। राज ठाकरे ने संसद में सरकार द्वारा स्वीकार किए गए आंकड़ों का भी जिक्र किया।

यह बयान सिर्फ दो अभिनेताओं तक सीमित नहीं। यह बड़े पैमाने पर देश छोड़ने की प्रवृत्ति पर सवाल है। बॉलीवुड के चेहरे इसलिए चुने गए क्योंकि वे जनता के बीच पहचाने जाते हैं। आम उद्योगपति का नाम लेने से उतनी चर्चा नहीं होती।

बॉलीवुड और राजनीति का जटिल रिश्ता

बॉलीवुड और राजनीति का रिश्ता हमेशा से जटिल रहा है। कई अभिनेता राजनीतिक बयानबाजी करते हैं, फिल्मों में राजनीतिक संदेश देते हैं या किसी नेता की तारीफ करते हैं। जब वे व्यक्तिगत फैसले लेते हैं तो आलोचना भी झेलनी पड़ती है। विवेक ओबेरॉय की “पीएम नरेंद्र मोदी” फिल्म विवादास्पद रही थी। आर. माधवन ने समय-समय पर मोदी सरकार के कामों की तारीफ की है।

राज ठाकरे ने इन्हीं फिल्मों का हवाला देकर अपना तर्क मजबूत किया। उनका इशारा था कि तारीफ और किरदार तो भारत में, लेकिन जीवन विदेश में। यह सवाल कई लोगों को जायज लगता है। दूसरी तरफ कुछ लोग कहते हैं कि कलाकारों का काम कला है। वे किसी किरदार को निभाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वे राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए।

सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों के निजी फैसलों पर नजर रहती है। जब कोई व्यक्ति देश के विकास की बात करता है तो लोग उम्मीद करते हैं कि वह खुद भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बने। लेकिन जीवन इतना सरल नहीं होता। परिवार की जरूरतें, करियर के अवसर, बच्चों का भविष्य – ये सब जटिल फैसले होते हैं।

युवाओं का विदेश जाना और ब्रेन ड्रेन

Raj Thackeray ने जो मुद्दा उठाया है वह सिर्फ अभिनेताओं तक सीमित नहीं। भारतीय युवाओं का विदेश जाना एक बड़ी प्रवृत्ति बन गई है। कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दुबई, सिंगापुर – ये जगहें आकर्षण का केंद्र हैं। कारण शिक्षा की गुणवत्ता, नौकरियां, जीवनशैली और सुरक्षा होते हैं।

कई सर्वे बताते हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए बाहर भेजना चाहते हैं। शहरों में ट्रैफिक, प्रदूषण, महंगाई, नौकरियों की कमी – ये रोजमर्रा की समस्याएं हैं। जब कोई पब्लिक फिगर विदेश बस जाता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन ग्लोबलाइजेशन के दौर में लोग अवसरों के पीछे जाते हैं। भारत से बाहर रहकर भी कई भारतीय देश की सेवा करते हैं। रेमिटेंस भेजते हैं, निवेश करते हैं, ज्ञान लाते हैं।

दुबई की लोकप्रियता समझने लायक है। कई भारतीय परिवार वहां बस रहे हैं। टैक्स व्यवस्था, सुरक्षा, सुविधाएं और भारत से नजदीकी प्रमुख कारण हैं। फ्लाइट से कुछ घंटों में मुंबई या दिल्ली पहुंचा जा सकता है। कई लोग इसे “होम अवे फ्रॉम होम” कहते हैं।

सार्वजनिक प्रतिक्रियाएं और बहस

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं मिश्रित रहीं। कुछ यूजर्स ने कहा कि सही सवाल पूछा गया। विकास की तारीफ करने वाले अगर खुद देश छोड़ दें तो सवाल उठना चाहिए। कुछ ने कहा कि अभिनेताओं के निजी फैसले पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। दोनों के पुराने स्पष्टीकरण को दोहराया गया।

कुछ लोगों ने राज ठाकरे का समर्थन करते हुए कहा कि युवाओं की हताशा को आवाज दी गई है। कुछ ने कहा कि देशभक्ति का मतलब सिर्फ भारत में रहना नहीं है। कई भारतीय विदेश में रहकर भी देश के लिए काम करते हैं।

बहस कई स्तरों पर चल रही है। एक तरफ लोग कहते हैं कि सार्वजनिक तारीफ और निजी जीवन के फैसले एक जैसे होने चाहिए। दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और परिवार की जरूरतों की बात होती है।

राजनीतिक अपडेट हिंदी

बड़े सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ

इस घटना ने एक बड़े सवाल को फिर से उठा दिया है – देशभक्ति की परिभाषा क्या है? क्या देश में रहना ही देशभक्ति है या देश के लिए काम करना भी? क्या सार्वजनिक तारीफ और निजी जीवन के फैसले एक जैसे होने चाहिए? ये सवाल आसान नहीं हैं। हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं।

राज ठाकरे का बयान पढ़ते हुए लगता है कि वे युवाओं की हताशा को आवाज दे रहे हैं। कई युवा महसूस करते हैं कि विकास के दावों और जमीनी हकीकत में फर्क है। शहरों में सुविधाओं की कमी, शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं, रोजगार के अवसर – ये सब चर्चा के विषय हैं।

उद्योगपतियों और प्रोफेशनल्स के देश छोड़ने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। अगर प्रतिभाशाली लोग बेहतर अवसरों के लिए बाहर जाते हैं तो देश को नुकसान होता है। साथ ही जो लोग बाहर रहकर भारत से जुड़े रहते हैं वे भी योगदान देते हैं।

बॉलीवुड के संदर्भ में यह घटना याद दिलाती है कि कलाकार जब राजनीतिक बयानबाजी करते हैं या राजनीतिक किरदार निभाते हैं तो उनके निजी फैसलों पर भी नजर पड़ती है। यह चक्र जारी रहने वाला है।

निष्कर्ष और आगे की राह

Raj Thackeray ने जो सवाल उठाया है वह सिर्फ दो अभिनेताओं तक सीमित नहीं। यह बड़े पैमाने पर देश छोड़ने की प्रवृत्ति, युवाओं की हताशा और विकास के दावों की पड़ताल है। चाहे कोई सहमत हो या असहमत, सवाल महत्वपूर्ण है।

विवेक ओबेरॉय और आर. माधवन ने अपने कारण पहले बता दिए थे। बिजनेस और बेटे के करियर। दोनों ने भारत से जुड़ाव बनाए रखने की बात कही। राज ठाकरे का बयान युवा मुद्दों के व्यापक संदर्भ में आया।

आगे क्या होगा यह देखना बाकी है। क्या अभिनेता जवाब देंगे? क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे को आगे बढ़ाएंगे? क्या युवा मुद्दों पर और चर्चा होगी? फिलहाल यह खबर महाराष्ट्र और बॉलीवुड दोनों की चर्चा में है।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि राजनीति और मनोरंजन की दुनिया कितनी करीब आ गई है। अभिनेता फिल्मों में नेताओं के किरदार निभाते हैं, तारीफ करते हैं और फिर जब निजी जीवन के फैसले लेते हैं तो सवालों के घेरे में आ जाते हैं।

देशभक्ति, विकास, अवसर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता – इन सबके बीच संतुलन बनाना आसान नहीं। राज ठाकरे का सवाल कई भारतीयों के मन में है। सही या गलत का फैसला हर व्यक्ति खुद करेगा। लेकिन सवाल उठना और उस पर चर्चा होना लोकतंत्र का हिस्सा है।

विस्तारित विश्लेषण: राज ठाकरे का राजनीतिक सफर और एमएनएस की भूमिका

Raj Thackeray का राजनीतिक सफर महाराष्ट्र की राजनीति को समझने के लिए जरूरी है। वे बाल ठाकरे के भतीजे हैं। शिवसेना में लंबे समय तक रहे। बाद में अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। उनका फोकस हमेशा स्थानीय मुद्दों पर रहा – मराठी भाषा, संस्कृति, युवा रोजगार, और मुंबई की समस्याएं। वे तीखे भाषणों के लिए जाने जाते हैं। उनके बयान अक्सर वायरल होते हैं।

एमएनएस की राजनीति में छात्र संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बीसवीं वर्षगांठ का कार्यक्रम युवाओं को जोड़ने का मौका था। राज ठाकरे ने वहां विकास के बड़े दावों और जमीनी हकीकत के बीच के फर्क को रेखांकित किया। उन्होंने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स का जिक्र किया। कहा कि शोर तो बहुत मचा लेकिन शहरों की हालत नहीं सुधरी। बच्चे बाहर जाना चाहते हैं क्योंकि यहां सुविधाएं नहीं।

यह बात कई मध्यमवर्गीय परिवारों की वास्तविकता से मेल खाती है। मुंबई, पुणे, नागपुर जैसे शहरों में ट्रैफिक, प्रदूषण, आवास की समस्याएं आम हैं। खेल के मैदान कम होते जा रहे हैं। पार्क और खुली जगहें सिकुड़ रही हैं। शिक्षा व्यवस्था में प्राइवेट कोचिंग का दबदबा बढ़ गया है। इन सबके बीच युवा बेहतर जीवन की तलाश में बाहर देखते हैं।

राज ठाकरे ने उद्योगपतियों का भी जिक्र किया। पिछले कुछ सालों में कई बिजनेसमैन विदेश में बेस बना रहे हैं। कुछ सिंगापुर, कुछ दुबई, कुछ लंदन। कारण अलग-अलग हो सकते हैं – बिजनेस की आसानी, टैक्स, सुरक्षा या परिवार की सुविधा। राज ठाकरे का कहना था कि अगर सब कुछ इतना अच्छा है तो ये लोग क्यों जा रहे हैं।

विवेक ओबेरॉय का करियर और बिजनेस सफर

विवेक ओबेरॉय का करियर 2000 के दशक की शुरुआत में चमक के साथ शुरू हुआ। “कंपनी”, “साथिया”, “मुंबई से आई यार” जैसी फिल्मों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। बाद में करियर में उतार-चढ़ाव आए। कुछ फिल्में चलीं, कुछ नहीं। उन्होंने अभिनय के साथ-साथ बिजनेस में रुचि दिखाई।

कोविड के दौरान दुबई जाना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। उन्होंने रियल एस्टेट में कदम रखा। दुबई में प्रोजेक्ट्स शुरू किए। परिवार के साथ रहने का फैसला लिया। उन्होंने कई इंटरव्यू में कहा कि दुबई में काम करने की आजादी और पॉजिटिव एनवायरनमेंट मिला। स्थानीय कानूनों का सम्मान करो तो कोई दिक्कत नहीं।

उनके बिजनेस में कई लोग काम करते हैं। अलग-अलग देशों के लोग। उन्होंने कहा कि दुबई ने उन्हें पंख दिए। वे मुंबई को घर मानते हैं लेकिन दुबई भी घर जैसा लगने लगा। बच्चों के साथ समय बिताना, काम-लाइफ बैलेंस – ये चीजें उन्हें मिलीं।

राज ठाकरे के सवाल के संदर्भ में विवेक का केस दिलचस्प है। उन्होंने मोदी की बायोपिक में किरदार निभाया। फिल्म चर्चा में रही। अब जब वे दुबई में हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन उनके स्पष्टीकरण से लगता है कि फैसला बिजनेस और परिवार पर आधारित था।

आर. माधवन का परिवार और बेटे का स्विमिंग करियर

आर. माधवन लंबे समय से साउथ और हिंदी सिनेमा दोनों में सक्रिय हैं। वे गंभीर अभिनेता माने जाते हैं। परिवार के साथ उनका जुड़ाव गहरा है। बेटा वेदांत स्विमिंग में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। कोविड के दौरान जब भारत में पूल बंद थे तो परिवार ने दुबई का रुख किया।

माधवन ने विस्तार से बताया कि उस समय अन्य देशों में सुविधाएं उपलब्ध थीं। दुबई में भी क्लासेस चल रही थीं। पत्नी ने पहल की। फैसला सही साबित हुआ। वेदांत की ट्रेनिंग जारी रही। माधवन ने कहा कि वे भारत से जुड़े हुए हैं। काम और टैक्स दोनों भारत में।

यह केस दिखाता है कि माता-पिता बच्चों के भविष्य के लिए बड़े फैसले लेते हैं। खेल के क्षेत्र में सुविधाएं मायने रखती हैं। भारत में कई खिलाड़ी बेहतर ट्रेनिंग के लिए बाहर जाते हैं।

शहरों की हालत और युवा हताशा

राज ठाकरे ने शहरों की हालत पर जोर दिया। स्मार्ट सिटी का शोर लेकिन हकीकत अलग। सड़कें खराब, पार्क कम, खेल सुविधाएं अपर्याप्त, सफाई की समस्या। युवा इन सबको देखते हैं और बाहर बेहतर जीवन की कल्पना करते हैं।

यह समस्या सिर्फ महाराष्ट्र की नहीं। पूरे देश के बड़े शहरों में समान मुद्दे हैं। आवास महंगा, ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव। इन सबके बीच विदेश आकर्षक लगता है।

ब्रेन ड्रेन एक बड़ी चुनौती है। प्रतिभाशाली युवा बाहर जाते हैं। कुछ लौटते हैं, कुछ नहीं। जो लौटते हैं वे अनुभव लेकर आते हैं। जो नहीं लौटते वे रेमिटेंस भेजते हैं। लेकिन लंबे समय में देश की क्षमता प्रभावित होती है।

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Jyoti Rajput

Jyoti Rajput

Jyoti Rajput एक सम्मानित पत्रकार और लेखक हैं, जो zeehulchul.com पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचारों को प्रमाणिकता के साथ रिपोर्ट करते हैं। Jyoti Rajput ने 4 वर्षों में गहरी मीडिया विशेषज्ञता हासिल की है और हमेशा शोध-प्रधान और तथ्य आधारित लेखन पर ध्यान केंद्रित किया है। इनकी रिपोर्टिंग का उद्देश्य सत्य, निष्पक्षता और पाठकों की जानकारी का सही तरीके से संरक्षण करना है, ताकि वे केवल भरोसेमंद और सटीक खबरें प्राप्त कर सकें।

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VCK क्या है? पार्टी की शुरुआत और विचारधारा Viduthalai Chiruthaigal Katchi यानी VCK, तमिलनाडु की एक मजबूत दलित-केंद्रित पार्टी है।...

by Jyoti Rajput
May 9, 2026

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