गिग इकोनॉमी का मतलब है ऐसी नौकरियां जहां काम शॉर्ट-टर्म, फ्रीलांस या ऐप-बेस्ड होता है। कोई फिक्स्ड सैलरी नहीं, कोई ऑफिस नहीं – बस ऐप पर लॉगिन करो और काम शुरू। भारत में Swiggy, Zomato, Blinkit, Zepto, Uber, Ola, Amazon और Flipkart जैसे प्लेटफॉर्म्स पर लाखों डिलीवरी पार्टनर्स, ड्राइवर्स और सर्विस प्रोवाइडर्स गिग वर्कर्स हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की गिग इकोनॉमी दुनिया में सबसे तेज बढ़ रही है। 2025 में यह सेक्टर 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहा है। लेकिन “Gig Workers in India” की हकीकत यह है कि ये वर्कर्स औसतन 12-14 घंटे काम करते हैं, फिर भी उनकी कमाई अनिश्चित रहती है। मौसम खराब हो, ट्रैफिक जाम हो या ऐप का एल्गोरिदम बदल जाए – कमाई पर सीधा असर। कई युवा इसमें इसलिए आए क्योंकि पारंपरिक नौकरियां कम हैं, लेकिन अब चुनौतियां बढ़ गई हैं।
भारत में गिग वर्कर्स की मौजूदा स्थिति: आंकड़े और दिक्कतें
2025 में गिग वर्कर्स की संख्या करोड़ों में है। अकेले फूड और क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर 30 लाख से ज्यादा वर्कर्स हैं। लेकिन ये “इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर्स” कहलाते हैं, यानी पारंपरिक कर्मचारियों जैसे फायदे नहीं – कोई पेड लीव, हेल्थ इंश्योरेंस या पेंशन नहीं।
एक औसत गिग वर्कर महीने में 20-25 हजार रुपये कमाता है, लेकिन पेट्रोल, व्हीकल मेंटेनेंस और अन्य खर्च निकालें तो हाथ में बहुत कम बचता है। महंगाई और फ्यूल कीमतें बढ़ने से स्थिति और खराब। ऐप्स के एल्गोरिदम पर शिकायतें आम हैं – लेट डिलीवरी पर पेनल्टी, भले वजह ट्रैफिक हो। “Gig Workers in India” के लिए असुरक्षा बड़ी समस्या है। एक्सीडेंट्स होते रहते हैं, लेकिन कवरेज कम। महिलाओं की भागीदारी भी कम क्योंकि रात की शिफ्ट्स रिस्की लगती हैं। कुल मिलाकर, यह काम स्पीड और रिस्क का खेल बन गया है।





















