4 अगस्त 2026 की शाम भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐसा दिन बन गई जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। उस दिन जब खबर आई कि Pradeep Rawat नहीं रहे, तो कई पीढ़ियों के दर्शकों के मन में एक खालीपन सा महसूस हुआ। महाभारत के अश्वत्थामा, लगान के देवा सिंह सोढ़ी, गजनी के गजनी धर्मात्मा और तेलुगु सिनेमा के भिक्षु यादव – ये सभी किरदार एक ही व्यक्ति की कला के अलग-अलग रंग थे। 74 साल की उम्र में उन्होंने भीवंडी के अस्पताल में अंतिम सांस ली। ब्लड कैंसर से पांच साल की लंबी लड़ाई के बाद शरीर ने जवाब दे दिया।
उनके मैनेजर सिद्धार्थ तिवारी ने खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि एक्टर पहले एक बार बीमारी से उबर चुके थे, लेकिन कुछ महीने पहले कैंसर दोबारा लौट आया। पिछले एक महीने से वे अस्पताल में भर्ती थे। हाल के दिनों में प्लेटलेट काउंट अचानक गिर गया और उसके बाद हालत तेजी से बिगड़ती चली गई। शाम करीब छह से साढ़े छह बजे के बीच उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
यह खबर सबसे पहले यशपाल शर्मा के इंस्टाग्राम स्टोरी से फैली। लगान में उनके सह-कलाकार ने लिखा – “हमारा गजनी, लगान का देवा प्रदीप रावत अब नहीं रहा। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।” उसके बाद सोशल मीडिया पर शोक संदेशों का सैलाब आ गया। सोनू सूद, उद्योग के अन्य कलाकारों और हजारों प्रशंसकों ने अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
जबलपुर से शुरू हुई यात्रा – बचपन और प्रारंभिक जीवन
Pradeep Rawat का जन्म 21 जनवरी 1952 को मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था। परिवार की जड़ें हरियाणा के अंबाला से जुड़ी थीं। पिता एम.एस. रावत भारतीय सेना से रिटायर्ड थे और मां एम.एम. रावत घर की देखभाल करती थीं। साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े प्रदीप ने अपनी पढ़ाई जबलपुर में ही पूरी की।
युवावस्था में वे यूको बैंक की राइट टाउन शाखा में नौकरी करने लगे। बैंक की सुरक्षित नौकरी और नियमित जीवन कई लोगों के लिए सपना होता है, लेकिन प्रदीप के अंदर कुछ और ही चल रहा था। उन्हें अभिनय का शौक था। शरीर का ढांचा अच्छा था, आवाज गहरी और प्रभावी थी। दोस्तों और परिचितों के बीच वे अक्सर ड्रामों और छोटी-मोटी प्रस्तुतियों में हिस्सा लेते रहते थे।
बैंक की नौकरी छोड़कर मुंबई आने का फैसला आसान नहीं था। परिवार की जिम्मेदारियां थीं, भविष्य की अनिश्चितता थी। लेकिन कला के प्रति आकर्षण इतना प्रबल था कि उन्होंने जोखिम उठाया। 1980 के दशक की शुरुआत में वे मुंबई पहुंचे। शुरुआती दिन संघर्ष भरे रहे। छोटे-छोटे ऑडिशन, रिजेक्शन और आर्थिक तंगी – इन सबका सामना करते हुए वे आगे बढ़ते रहे।
फिल्मों में पहला कदम और महाभारत का जादू
1985 में Pradeep Rawat की पहली फिल्म आई – मेरी जंग। अनिल कपूर और नूतन की इस फिल्म में उन्होंने छोटा किरदार निभाया। उसी साल ऐतबार में भी वे नजर आए। इन फिल्मों में उनकी भूमिकाएं छोटी थीं, लेकिन स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति ध्यान खींचने वाली थी।
असली मोड़ 1988 में आया जब बी.आर. चोपड़ा की महाभारत शुरू हुई। इस धारावाहिक ने पूरे भारत को बांध रखा था। रविवार की सुबह टेलीविजन के सामने परिवार जमा हो जाते थे। प्रदीप रावत को गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का किरदार मिला। अश्वत्थामा एक जटिल चरित्र है – शक्तिशाली, अभिमानी, और अंत में शापग्रस्त। प्रदीप ने इस भूमिका को इतनी जीवंतता दी कि आज भी जब महाभारत की बात होती है तो अश्वत्थामा का चेहरा उनके रूप में ही याद आता है।
महाभारत ने उन्हें घर-घर पहचान दिलाई। दूरदर्शन के उस युग में टेलीविजन ही सबसे बड़ा माध्यम था। अश्वत्थामा के रूप में उनकी गहरी आंखें, गंभीर चेहरा और शक्तिशाली उपस्थिति दर्शकों के मन में बस गई। इस भूमिका के बाद फिल्मों में भी काम आने लगा, हालांकि मुख्य धारा की बड़ी भूमिकाएं अभी दूर थीं।
1990 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। अग्निपथ में अमिताभ बच्चन के साथ छोटे किरदार में नजर आए। बागी, अप्राधी, कोयला, मेजर साहब जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। इनमें से ज्यादातर सहायक या नकारात्मक किरदार थे। उस समय बॉलीवुड में विलेन की भूमिकाएं अक्सर अतिरंजित होती थीं, लेकिन प्रदीप अपनी संयमित शैली के कारण अलग दिखते थे।
सरफरोश और लगान – हिंदी सिनेमा में यादगार किरदार
1999 में जॉन मैथ्यू मैथन की सरफरोश आई। आमिर खान की इस फिल्म में प्रदीप रावत ने सुल्तान का किरदार निभाया। आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े इस चरित्र में उनकी गंभीरता और ठंडे स्वभाव ने फिल्म को मजबूती दी। सरफरोश उस समय की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है और प्रदीप का योगदान इसमें उल्लेखनीय रहा।
फिर आया 2001 – लगान। आशुतोष गोवारिकर की इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाई दी। ऑस्कर के लिए नामित हुई इस फिल्म में प्रदीप रावत ने देवा सिंह सोढ़ी का किरदार निभाया। एक सिक्ख खिलाड़ी जो गांव की क्रिकेट टीम में शामिल होता है। देवा का किरदार भावनात्मक और शक्तिशाली दोनों था। जब वे टीम में आते हैं तो कहानी में एक नया आयाम जुड़ जाता है। उनकी मौजूदगी से टीम की ताकत बढ़ती है और दर्शक उनके साथ जुड़ जाते हैं।
लगान में प्रदीप का अभिनय आज भी सराहा जाता है। यशपाल शर्मा, जो उसी फिल्म में उनके साथ थे, बाद में उनकी दोस्ती को याद करते रहे। लगान के सेट पर बने संबंध लंबे समय तक चले।
दक्षिण भारतीय सिनेमा में तूफान – स्ये और उसके बाद
2004 में Pradeep Rawat की जिंदगी में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट आया। एस.एस. राजामौली की तेलुगु फिल्म स्ये (Sye) में उन्होंने भिक्षु यादव का किरदार निभाया। यह फिल्म रग्बी पर आधारित थी और प्रदीप का विलेन किरदार इतना प्रभावशाली निकला कि उन्होंने तीन बड़े पुरस्कार जीते – फिल्मफेयर बेस्ट विलेन (तेलुगु), नंदी अवॉर्ड और संतोषम अवॉर्ड।
स्ये के बाद तेलुगु सिनेमा में उनके लिए दरवाजे खुल गए। भद्रा, अंदरिवादु, छत्रपति, लक्ष्मी, स्टालिन, देसमुदुरु, योगी, जगदम जैसी फिल्मों में वे लगातार काम करते रहे। उनकी शैली दक्षिण भारतीय दर्शकों को बहुत पसंद आई। वहां विलेन की भूमिकाओं को बहुत महत्व दिया जाता है और प्रदीप उस जगह को पूरी तरह भरने में सफल रहे।
तमिल सिनेमा में 2005 की गजनी ने उन्हें नई पहचान दी। ए.आर. मुरुगादॉस की इस फिल्म में उन्होंने डबल रोल निभाया – राम और लक्ष्मण। दोनों किरदार अलग-अलग थे लेकिन एक ही अभिनेता द्वारा निभाए गए। उनकी परफॉर्मेंस इतनी मजबूत थी कि जब फिल्म का हिंदी रीमेक बना तो आमिर खान ने उन्हें फिर से वही भूमिका दी। 2008 की गजनी हिंदी संस्करण में वे गजनी धर्मात्मा बने। यह फिल्म बॉलीवुड की पहली 100 करोड़ क्लब में पहुंचने वाली फिल्मों में से एक बनी और प्रदीप का योगदान इसमें महत्वपूर्ण रहा।
विस्तृत फिल्मोग्राफी – भाषाओं और दशकों के पार
Pradeep Rawat की फिल्मोग्राफी बहुत लंबी है। हिंदी, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, भोजपुरी, मराठी और नेपाली सिनेमा – लगभग हर प्रमुख भाषा में उन्होंने काम किया।
हिंदी में प्रमुख फिल्में: मेरी जंग, ऐतबार, अग्निपथ, बागी, सरफरोश, लगान, द हीरो, दीवार, गजनी, शाबरी, ग्रैंड मस्ती, सिंह इज ब्लिंग और हाल की छावा।
तेलुगु में: स्ये, भद्रा, छत्रपति, स्टालिन, देसमुदुरु, नायक, अल्लुडु सीनू, लायन, सरदार गब्बर सिंह, सरैनोडु, नेने राजू नेने मंत्री, जय लव कुश, आदवल्लु मीकु जोहारलू, वाल्तेयर वीरय्या और 2026 की गायपड्डा सिंहम्।
तमिल में: थोट्टी जया, गजनी, सबरी, वधियार, आसल, राजपट्टई, मिरट्टल, हरिदास, जिल्ला, वीरम, आंबाला, शिव लिंग, मार्केट राजा एमबीबीएस, गुलू गुलू और डीडी रिटर्न्स।
कन्नड़, मलयालम और अन्य भाषाओं में भी कई फिल्में हैं। नेपाली फिल्म आ बाटा आमा और उसकी सिक्वेल में भी उन्होंने काम किया। उनकी अंतिम रिलीज फिल्मों में गायपड्डा सिंहम् और छावा शामिल हैं।
हर भाषा में उन्होंने अपनी शैली को बरकरार रखा। वे ज्यादा बात नहीं करते थे। उनकी आंखें, चेहरे के भाव और शरीर की भाषा ही कहानी कह देती थी। यह कला आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है।
व्यक्तिगत जीवन – परिवार और परदे के पीछे का व्यक्ति
Pradeep Rawat की पत्नी का नाम कल्याणी रावत है। बेटा विक्रमादित्य है। परिवार हमेशा उनके साथ रहा। उद्योग के लोगों के अनुसार वे परदे के पीछे बहुत शांत और संजीदा स्वभाव के व्यक्ति थे। विलेन की भूमिकाएं निभाने के बावजूद व्यक्तिगत जीवन में वे विनम्र और मददगार माने जाते थे।
वे कभी सुर्खियों में रहने वाले स्टार नहीं बने। न कोई विवाद, न कोई सनसनीखेज खबर। काम करके घर लौट जाना – यही उनका तरीका था। कई सहयोगी कलाकारों ने बाद में याद किया कि सेट पर वे हमेशा प्रोफेशनल रहते थे और जूनियर आर्टिस्ट्स के साथ भी अच्छा व्यवहार करते थे।
कैंसर से जंग – पांच साल का संघर्ष
करीब पांच साल पहले प्रदीप रावत को ब्लड कैंसर का पता चला। उन्होंने इलाज करवाया और एक बार बीमारी नियंत्रित हो गई। परिवार और करीबी लोगों ने राहत की सांस ली। लेकिन कैंसर जैसी बीमारी अक्सर वापस आ जाती है। डेढ़ महीने पहले रिलेप्स हुआ। प्लेटलेट काउंट गिरने लगा। कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया। बाद में भीवंडी के विशेष कैंसर अस्पताल में शिफ्ट किया गया। डॉक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद शरीर ने जवाब दे दिया।
इस दौरान परिवार ने बहुत धैर्य दिखाया। बीमारी की खबर ज्यादा सार्वजनिक नहीं की गई। प्रदीप खुद भी चुपचाप संघर्ष करते रहे। अंतिम दिनों में हालत बहुत खराब हो गई थी।
निधन की खबर और उद्योग की प्रतिक्रिया
4 अगस्त शाम जब खबर फैली तो पूरा फिल्म जगत स्तब्ध रह गया। यशपाल शर्मा की पोस्ट के बाद कई कलाकारों ने श्रद्धांजलि दी। सोनू सूद ने उन्हें “प्रदीप भाई” कहकर याद किया। अन्य सहयोगियों ने भी अपनी यादें साझा कीं।
प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर पुरानी क्लिप्स शेयर कीं। महाभारत के अश्वत्थामा वाले सीन, लगान के क्रिकेट मैच वाले पल, गजनी के डरावने संवाद – सब कुछ फिर से चर्चा में आ गया। कई युवा दर्शकों को पहली बार पता चला कि गजनी के विलेन और महाभारत के अश्वत्थामा एक ही व्यक्ति थे।
अंतिम संस्कार – 5 अगस्त की विदाई
5 अगस्त 2026 को मुंबई में अंतिम संस्कार हुआ। गोरेगांव वेस्ट स्थित इंपीरियल हाइट्स में दोपहर दो बजे से चार बजे तक अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर रखा गया। उसके बाद शाम चार बजे जोगेश्वरी वेस्ट के ओशिवारा श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। परिवार, करीबी दोस्त और उद्योग के कई लोग मौजूद रहे। यशपाल शर्मा ने भी अंतिम दर्शन किए।
विरासत – चरित्र अभिनेता की असली ताकत
Pradeep Rawat की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने विलेन और चरित्र भूमिकाओं को सम्मान दिया। बॉलीवुड में अक्सर हीरो के पीछे चरित्र कलाकार खो जाते हैं। लेकिन प्रदीप ने अपनी जगह बनाई। दक्षिण भारतीय सिनेमा में तो वे एक ब्रांड बन गए।
उनकी शैली आज के समय में भी प्रासंगिक है। जब कई अभिनेता ओवर-एक्टिंग करते दिखते हैं, तब प्रदीप की संयमित, तीव्र और प्रभावशाली परफॉर्मेंस याद आती है। उन्होंने साबित किया कि बिना ज्यादा संवाद के भी दर्शकों को प्रभावित किया जा सकता है।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई महान विलेन हुए हैं – अमरीश पुरी, प्रेम चोपड़ा, गुलशन ग्रोवर, प्रान। प्रदीप रावत का नाम भी उसी श्रेणी में आता है, खासकर 2000 के बाद के दशक में। उन्होंने उत्तर और दक्षिण दोनों उद्योगों को जोड़ा। यह काम बहुत कम कलाकार कर पाते हैं।
युवा पीढ़ी और यादें
आज की युवा पीढ़ी प्रदीप रावत को मुख्य रूप से गजनी और लगान से जानती है। लेकिन पुरानी पीढ़ी उन्हें महाभारत के अश्वत्थामा के रूप में याद करती है। दोनों पीढ़ियों के लिए वे अलग-अलग अर्थ रखते हैं। यह उनके करियर की विविधता का प्रमाण है।
उनकी फिल्मों को फिर से देखना अब और भी खास हो गया है। हर किरदार में उनकी मेहनत झलकती है। चाहे वह छोटा सा सीन हो या मुख्य विलेन का लंबा रोल – उन्होंने हर भूमिका को न्याय दिया।
सिनेमा में चरित्र कलाकारों का महत्व
Pradeep Rawat की कहानी हमें याद दिलाती है कि सिनेमा सिर्फ हीरो-हीरोइन का नहीं होता। कहानी को आगे बढ़ाने वाले, माहौल बनाने वाले और यादगार पल देने वाले चरित्र कलाकार भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। उनकी अनुपस्थिति में कई फिल्में अधूरी लगती हैं।
आज जब इंडस्ट्री में स्टारडम और सोशल मीडिया की होड़ है, तब प्रदीप जैसे कलाकार याद आते हैं जो सिर्फ काम पर फोकस करते थे। वे कभी ट्रेंडिंग में रहने की कोशिश नहीं करते थे। काम की गुणवत्ता ही उनकी पहचान थी।
अंतिम विचार
Pradeep Rawat चले गए, लेकिन उनकी कला बनी रहेगी। महाभारत के अश्वत्थामा के रूप में वे हमेशा याद किए जाएंगे। लगान के देवा के रूप में वे गांव की टीम की ताकत का प्रतीक रहेंगे। गजनी के धर्मात्मा के रूप में वे भय और शक्ति का मिश्रण बने रहेंगे। स्ये के भिक्षु यादव के रूप में वे दक्षिण भारतीय सिनेमा के यादगार विलेन बने रहेंगे।
परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति मिले। उनकी आत्मा को शांति मिले। भारतीय सिनेमा एक ऐसे कलाकार को खो चुका है जिसने बिना शोर किए अपनी जगह बनाई और दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।
प्रदीप रावत – आपका अभिनय हमें हमेशा प्रेरित करता रहेगा। ओम शांति।


















