Indians in Russian Army : दिसंबर 2025 के आखिरी दिनों में भारत में एक ऐसी खबर तेजी से वायरल हो रही है, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया है। पंजाब के जालंधर जिले के गोराया गांव के रहने वाले जगदीप कुमार ने अपने लापता भाई मंदीप कुमार की तलाश में रूस का दो बार दौरा किया। उनकी इस यात्रा ने एक ऐसी सच्चाई सामने ला दी, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। जगदीप ने बताया कि रूसी सेना में धोखे से शामिल हुए कम से कम 10 भारतीयों की मौत हो चुकी है, जबकि 4 युवा अभी भी लापता हैं।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं है। यह उन हजारों भारतीय युवाओं की कहानी है, जो बेहतर जीवन की तलाश में विदेश जाते हैं, लेकिन नौकरी के नाम पर युद्ध के मैदान में धकेल दिए जाते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से लेकर अब तक, रूसी सेना में शामिल हुए भारतीयों की संख्या 200 से ज्यादा बताई जा रही है। इनमें से 26 की मौत हो चुकी है, 7 लापता हैं और करीब 50 अभी भी फंसे हुए हैं। जगदीप कुमार का खुलासा इस पूरे संकट को और गहरा कर रहा है।

जगदीप कुमार का सफर – भाई की तलाश में दो बार रूस
जगदीप कुमार की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं। उनका छोटा भाई मंदीप कुमार कुछ साल पहले बेहतर नौकरी की तलाश में रूस गया था। शुरू में सब ठीक था, लेकिन मार्च 2024 के बाद मंदीप से कोई संपर्क नहीं हुआ। फोन बंद, मैसेज का कोई जवाब नहीं। परिवार में चिंता बढ़ती गई। जगदीप ने मदद के लिए राज्यसभा सांसद संत बलबीर सिंह सीचेवाल से संपर्क किया, जिन्होंने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया।
सीचेवाल ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को पत्र लिखा और जगदीप की रूस यात्रा के लिए टिकट और जरूरी पत्रों की व्यवस्था की। जगदीप पहली बार 21 दिनों के लिए रूस गए। वहां भाषा की समस्या, दस्तावेजी अड़चनें और अधिकारियों की अनदेखी – सब कुछ उनके सामने आया। फिर भी कुछ पता नहीं चला।
दूसरी बार वे दो महीने तक मॉस्को में रुके। इस दौरान रूसी अधिकारियों से संपर्क साधकर उन्हें एक लिस्ट मिली, जिसमें 10 भारतीयों की मौत की पुष्टि थी। इनमें से तीन पंजाब के थे – तेजपाल सिंह (अमृतसर) सहित। बाकी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से थे। मृतकों में अरविंद कुमार, धीरेंद्र कुमार, विनोद यादव, योगेंद्र यादव जैसे नाम शामिल थे। लापता चार युवा थे – दीपक, योगेश्वर प्रसाद, अजहरुद्दीन खान और राम चंद्र।
जगदीप ने बताया कि एक बार उन्हें छोटी दस्तावेजी गलती पर हिरासत में लिया गया और सेना में शामिल होने का दबाव डाला गया। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इन दस्तावेजों को उन्होंने सांसद सीचेवाल के कार्यालय में जमा किया। दुर्भाग्य से, मंदीप का अभी भी कोई सुराग नहीं मिला। उनकी यह यात्रा न केवल एक भाई के दर्द की कहानी है, बल्कि उन सभी परिवारों की आवाज है जो अपने अपनों को खो चुके हैं।
भर्ती का धोखा – कैसे फंस रहे हैं भारतीय युवा?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रूस को भारी सैनिकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसी कमी को पूरा करने के लिए वे विदेशी नागरिकों की भर्ती कर रहे हैं। लेकिन भारत में यह ज्यादातर धोखाधड़ी के जरिए हो रही है। एजेंट युवाओं को सिक्योरिटी गार्ड, हेल्पर, क्लीनर या स्टूडेंट वीजा पर नौकरी का लालच देते हैं। 1-2 लाख रुपये महीना कमाने का वादा करते हैं।
रूस पहुंचते ही पासपोर्ट जब्त कर लिया जाता है। छोटी-छोटी गलतियों पर जेल की धमकी दी जाती है और फिर एक ही विकल्प दिया जाता है – रूसी सेना में शामिल हो जाओ। कई युवा स्टूडेंट वीजा पर पढ़ने के लिए गए थे, लेकिन उन्हें भी युद्ध के मैदान में धकेल दिया गया। हाल ही में राजस्थान के अजय गोडारा और उत्तराखंड के राकेश कुमार मौर्या जैसे युवाओं की मौत की खबर आई, जो स्टूडेंट वीजा पर गए थे।
पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू जैसे राज्यों से सबसे ज्यादा युवा इस जाल में फंस रहे हैं। बेरोजगारी और गरीबी के कारण ये युवा आसानी से लालच में आ जाते हैं। एजेंटों का नेटवर्क बहुत मजबूत है। वे गांव-गांव में घूमकर लोगों को लुभाते हैं। यह सब पूरी तरह अवैध है, लेकिन अभी भी जारी है।
मौतों और लापताओं की सच्चाई
जगदीप द्वारा लाई गई लिस्ट में 10 मौतें पुष्टि हुईं। लेकिन विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक कुल 26 भारतीयों की मौत हो चुकी है। 7 लापता हैं और करीब 50 अभी भी रूसी सेना में फंसे हुए हैं। कई मौतें ऐसी हैं, जहां युवा बिना किसी ट्रेनिंग के फ्रंटलाइन पर भेज दिए गए।
परिवारों को शव वापस मिलने में महीनों लग जाते हैं। कुछ शव भारत लाए गए, लेकिन देरी के कारण उनका अंतिम संस्कार भी मुश्किल से हो पाया। ये मौतें सिर्फ आंकड़े नहीं हैं – ये परिवारों के सपनों का अंत हैं।
सरकारी प्रयास – क्या हो रहा है पर्याप्त?
भारतीय सरकार इस मुद्दे पर काफी सक्रिय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कई बार बात की। इसके बाद 119 भारतीयों को डिस्चार्ज करवाया गया। विदेश मंत्रालय ने एजेंटों के खिलाफ कई कार्रवाई की हैं और एडवाइजरी जारी की है।
लेकिन परिवारों का कहना है कि प्रयास धीमे हैं। सांसद संत बलबीर सिंह सीचेवाल लगातार सरकार से मांग कर रहे हैं कि रूसी सेना में भारतीयों की भर्ती पूरी तरह रोकी जाए और शवों को जल्द वापस लाया जाए। भारत-रूस के बीच मजबूत रिश्ते हैं, लेकिन इस मानवीय संकट पर दबाव बढ़ रहा है।
परिवारों का दर्द – सपनों का खात्मा
कल्पना कीजिए – एक मां अपने बेटे की राह देख रही है। फोन पर आवाज नहीं आती। अचानक खबर आती है कि बेटा मारा गया। पंजाब के तेजपाल सिंह की मां आज भी रोती हैं। उत्तर प्रदेश के परिवार कर्ज में डूबे हैं। विदेश भेजने के लिए लाखों रुपये उधार लिए थे। ये युवा परिवार की सबसे बड़ी उम्मीद थे।
यह सिर्फ मौत की कहानी नहीं है। यह बेरोजगारी, गरीबी और झूठे सपनों की त्रासदी है। सामाजिक संगठन अब गांव-गांव जाकर जागरूकता फैला रहे हैं।
वैश्विक प्रभाव – केवल भारत ही नहीं प्रभावित
यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। नेपाल, श्रीलंका, क्यूबा, अफ्रीकी देशों के युवा भी इस जाल में फंसे हैं। युद्ध की आग सीमाओं को पार कर रही है। भारत को अपनी विदेश नीति में युवाओं की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना होगा।
बचाव के तरीके – ऐसे जाल से कैसे बचें?
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विदेशी नौकरी की पेशकश आने पर तुरंत जांच करें। सिर्फ सरकारी पोर्टल (e-migrate) से एजेंट और कंपनी की वैधता चेक करें।
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अकेले फैसला न लें। परिवार और दोस्तों से सलाह लें।
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बहुत ज्यादा कमाई का वादा होने पर संदेह करें।
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विदेश मंत्रालय की हेल्पलाइन (1800-11-8797) पर संपर्क करें।
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गांव-शहर में जागरूकता अभियान चलाएं।




















